हनुमान बेनीवाल की उड़ान पर सतीश पूनिया लगाएंगे विराम

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भाजपा के एक तीर से होंगे दो शिकार

भाजपा ने मदन लाल सैनी के निधन के 82 दिन बाद अपने प्रदेशाध्यक्ष की घोषणा की। यह पद पहली बार किसी जाट नेता को मिला सभी को हैरानी हुई। पर राजनीतिक पंडितों की मानें तो भाजपा का थिंकटैंक ने बहुत सोच समझकर यह नाम आगे बढ़ाया है। क्योंकि राजस्थान भाजपा का मूल वोटर राजपूत समाज बहुत से कारणों से भाजपा से नाराज चल रहा है और राजस्थान में दूसरी बड़ी जाति जाट समुदाय है। जो मूल रूप से तो कांग्रेसी था पर गहलोत से नाराजगी के चलते और कोई विकल्प नहीं देखकर जाट समुदाय भाजपा की ओर मुड़ रहा है और भाजपा के सामने दूसरी परेशानी हनुमान बेनीवाल हैं। जो जाटों के सबसे बड़े नेता के रूप में उभर रहे हैं तथा उन्होंने अपनी पार्टी भी अलग बना रखी है। यह भाजपा में शामिल भी नहीं हो रहे ऐसे में नए अध्यक्ष सतीश पूनिया को हनुमान बेनीवाल की काट के रूप में भी देखा जा रहा है। भाजपा कांग्रेस के वोट बैंक में हो रहे इस सेंध का फायदा और किसी को नहीं लेने देना चाहती। फिलहाल तो यह दांव कारगर लग रहा है। हनुमान बेनीवाल को किनारे लगाकर भाजपा अपने आर एस एस पृष्ठभूमि वाले नेता को राजस्थान में बड़ा जाट नेता बनाना चाहती है। सतीश पूनिया की ताजपोशी का यही उद्देश्य प्रतीत होता है। भाजपा को जाटों से जोड़ने के लिए एक बड़े चेहरे की जरूरत थी। जो जाट होने के साथ मूल भाजपाई भी हो । सतीश पूनिया इस सांचे में फिट बैठते हैं। यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा कि यह फैसला कितना सही है अगर सही हुआ तो बड़ा कदम होगा और सही नहीं हुआ तो राजपूत समुदाय जो शुरू से लेकर आज तक भाजपा के साथ है वह भी भाजपा से छिटकर दूर जा सकता है।

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