मानव स्वास्थ्य के लिए भी जरूरी हैं उत्कृष्ट पशुचिकित्सा सेवाएँ

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डॉ. योगेश आर्य (नीम का थाना)

पिछले 20 वर्षों से मनाये जा रहे “विश्व पशुचिकित्सा दिवस” के लिए इस बार ‘विश्व पशुचिकित्सा एसोसियेशन’ ने थीम रखा हैं- “टीकाकरण का महत्व”| इस अवसर पर सेमीनार और कार्यशालाओं का आयोजन कर के पशुपालकों को पशुरोगोँ से बचाव हेतु टीकाकरण करवाने के लिए प्रेरित किया जाएगा और तमाम भ्रांतियां भी दूर की जायेगी। सोशल मीडिया पर अभियान चलेगा और मीडिया का भी सहयोग मिलेगा। टीकाकरण करवाने को लेकर वर्तमान समय मे काफी जागृति आ चुकी हैं, फिर चाहे वो मानव टिकाकरण हो या पशु टिकाकरण| ये भी सर्वविदित हैं कि टिकाकरण काफी सारे ज़ूनोटिक रोगो से भी बचाता है, जो कि पशुओं से मानव मे फैल सकते हैं| इस बीच ये भी एक महत्वपूर्ण तथ्य हैं कि तमाम तरह कि प्रगति के दावों के बीच पशुचिकित्सा सेवाओ मे काफी सुधार की दरकार हैं| इनकी आवश्यकता हर जगह है फिर चाहे वो शुद्ध और अधिक दूध उत्पादन हो या फिर गुणवत्तापूर्ण मांस और अंडा उत्पादन| 20वीं पशुगणना, 2017 में होना प्रस्तावित थी परन्तु अपरिहार्य कारणो से अभी भी पशुगणना के आंकड़े उपलब्ध नही हो पाए हैं। 19 वीं पशुगणना के अनुसार राजस्थान राज्य का 5.77 करोड़ पशुधन था और मरुप्रदेश के लिए ये एक सम्पदा की तरह हैं| राज्य के कुल “सकल घरेलु उत्पाद” में पशुधन सम्पदा का 10 % योगदान है| देश के कुल दुग्ध उत्पादन में राजस्थान का दूसरा स्थान है| अन्य पशु उत्पादों की बात करे तो राज्य का देश में ऊन उत्पादन में पहला और मांस उत्पादन में बारहवां स्थान है| सरकार पशुपालन व्यवस्थाओ को सुदृढ़ बनाकर किसानो की आर्थिक स्थिति को मजबूत कर सकती हैं। राष्ट्रीय कृषि आयोग के अनुसार प्रति 5 हजार पशुओ पर एक वेटरनरी डॉक्टर होना चाहिए, इस गणना के हिसाब से राज्य में लगभग 12 हजार वेटरनरी डॉक्टर्स होने चाहिए। तकनीकी रूप से दक्ष और प्रोफेशनल भाव रखने वाले युवाओं को मौका दिए जाने की आवश्यकता हैं। राज्य में आज भी पशुपालक नीम-हकीमों से अपने पशुओँ का इलाज करवाते हैं। उन नीम -हाकिमों द्वारा हॉर्मोन के अनाधिकृत उपयोग से पशुओं में बाँझपन बढ़ रहा हैं| अनधिकृत उपयोग के कारण एंटीबायोटिक्स अप्रभावी होती जा रही हैं जो कि पूरी खाद्य श्रुंखला के लिए खतरे की घंटी है| ऐसे में वेटरनरी डॉक्टर्स के ऊपर अधिक जिम्मेदारी होती हैं कि वो तय मानकों के अनुसार ही पशु उत्पादों की उपलब्धता को सुनिश्चित करें| कृषि एवं पशुपालन राज्य का विषय होता है, अतः राज्य सरकार को पशुचिकित्सा तकनिकी शिक्षा को और अधिक मजबूत बनाना चाहिए| वेटरनरी में उच्च शिक्षा और रिसर्च को भी प्रोत्साहित किया जाना चाहिए| वेटरनरी शिक्षा में रिसर्च को बढ़ावा दिया जाना अधिक आवश्यक हैं क्योंकि देशी पशु नस्ल की संख्या लगातार कम होती जा रही हैं| देशी नस्लों के पशु राजस्थान के वातावरण के प्रति अधिक अनुकूलित होते हैं, बीमार भी कम पड़ते है और अकाल के समय बेरी-पाला और खेजड़ी की पत्तियों पर भी गुजारा कर लेते है| देशी गायें ए2 प्रकार का दुग्ध देती हैं, जो की सुपाच्य और पोष्टिक होता है| सरकार ने गोपालन विभाग की स्थापना करके गौशालाओं पर ध्यान देना शुरू किया हैं| सरकार द्वारा देशी नस्लों के संरक्षण और संवर्धन के प्रयास किये जाने चाहिए| उन्नत नस्लों के पशुओं के पालन पर जोर दिया जाना चाहिए| गायों में चयन और उन्नयन पध्दतियों से दुग्ध उत्पादन में आशातीत वृद्धि होना निश्चित हैं| पशुचिकित्सा सेवाओं मे में सुधार के साथ साथ पशु पोषण पर भी ध्यान दिये जाने की महती आवश्यकता हैं| राजस्थान जैसे प्रदेश में वर्ष भर पशुओं के लिए संतुलित आहार उपलब्ध करवाना भी एक बड़ी चुनौती हैं| राजस्थान के अधिकांश भूभाग में वार्षिक वर्षा दर बहुत कम है| ऐसे में वर्षा ऋतू के अलावा पशुओ को वर्षभर हरा चारा उपलब्ध करवाना चुनौतीपूर्ण कार्य है| राष्ट्रीय कृषि आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार देश में 44% दाना मिश्रण, 38% हरे चारे और 40% सूखे चारे की कमी है| स्पष्टतया पशुपालक हरे चारे की कमी से जूझ रहे है जिसके कारण पशुओ में मिनरल व विटामिन की कमी होने से पशु कमजोर और रोगग्रस्त हो जाता है| इस समस्या से बचने के लिए वर्षा ऋतू में हरे चारे और चारा फसलों की अधिकता होने पर उनका ‘हे’ और ‘साइलेज’ के रूप में संरक्षण और संग्रहण किया जा सकता है और वर्ष भर पशुओ को खिलाने में उपयोग किया जा सकता है| पशुपालन में कुल लागत का लगभग 70 % खर्च केवल पशु आहार पर हो जाता है, अतः कृषि एवं पशुचिकित्सा वैज्ञानक लगातार हरे चारे के ऐसे विकल्पों की उपलब्धता पर कार्य करें जो कम लागत मे अधिक पौष्टिक,उच्च गुणवत्ता युक्त, संतुलित आहार हो| पशुपालन व्यवसाय में बढती लागत तथा दुग्ध उत्पादन में बढोतरी नहीं होने से छोटे किसानो का पशुपालन के प्रति रुझान घट सकता है| इसलिए युवा पशुपालको को अत्याधुनिक वैज्ञानिक तकनीको, नवीन अनुसंधानों के प्रयोग से अधिक दुध उत्पादन हेतु प्रेरित किया जाना चाहिए| पशुचिकित्सा सेवाओं, और लाभकारी योजनाओ का व्यापक प्रचार प्रसार भी आवश्यक हैं| अभी भी ग्रामीण इलाकों में पशुओं और पशुपालको के लिए कल्याणकारी योजनाओ के प्रति उतनी जागृति दिखाई नही देती हैं| पशुपालकों को अभी भी समय पर कृमिनाशन, टीकाकरण करवाने के फायदे नही पता हैं| पशुपालन विभाग जब भी टीकाकरण अभियान चलाता हैं तो उसे अपेक्षित सहयोग नही मिल पता हैं| पशुपालकों को अभी भी कृत्रिम गर्भाधान के लाभ और अवर्गीकृत नस्लों के नकारा नर पशुओं के बधियाकरण करवाने के लिए जागृत करने की जरूरत हैं| दूर दराज के इलाकों मे पशुओ का इलाज सिर्फ झाड-फूँक से ड़ाव लगाकर किया जा रहा हैं| इन व्यवस्थाओ मे परिवर्तन करने के लिए तकनीकी रूप से दक्ष और अधिक पशुचिकित्सा विशेषज्ञों की दरकार हैं| अतः सरकार पशुचिकित्सा सेवाओं पर अधिक ध्यान केन्द्रित करें| डेयरी स्थापित करने के लिए पशुपालकों को सस्ती दरों पर ऋण उपलब्ध करवाए| पशुओं के बीमा करवाने की प्रीमियम दरें कम करें| देशी नस्लों के पालन को प्रोत्साहित करे| उत्तम नस्ल के नर पशु ग्राम पंचायत स्तर पर उपलब्ध करवाए ताकि नस्ल सुधार किया जा सके| गौशालाओं की हालत सुधारें| और सबसे बड़ी बात ये कि पशुचिकित्सा प्रोफेसनल्स कि भर्ती करे ताकि ना केवल पशुधन को अकाल मृत्यु से बचाया जा सके बल्कि पशुधन उत्पादन मे वृद्धि हो सके| इस विश्व पशुचिकित्सा दिवस पर ये तो साफ हो चुका हैं कि वेटरनरी डॉक्टर्स को काफी नई चुनोतियाँ का सामना करना होगा, बस इसके लिए योजनाबद्ध तरीके से, अधिक प्रोफेशनल होकर और तकनीकी रूप से अधिक दक्ष होकर आगे बढ़ने की जरूरत हैं।

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