धुएं के वे छल्ले दिखने में भले स्टाइलिश लगे, लेकिन अंदर ही अंदर फेफड़ों, दिल और दिमाग को खोखला कर रहे हैं। सेक्टर-26, सेक्टर-35 और मोहाली के नयागांव व कांसल के कैफे लाउंज में देर रात तक उड़ते धुएं के छल्ले अब सिर्फ फन या स्टेटस सिंबल नहीं रहे, बल्कि युवाओं की सेहत के लिए बड़ा खतरा बन चुके हैं।
विश्व तंबाकू निषेध दिवस 2026 से पहले पीजीआई के विशेषज्ञों ने चंडीगढ़ ट्राइसिटी में तेजी से बढ़ते हुक्का कल्चर पर गंभीर चिंता जताई है। डॉक्टरों ने खुलासा किया है कि महज 1 घंटे का एक हुक्का सेशन शरीर को 100 सिगरेट जितना नुकसान पहुंचा सकता है।
चंडीगढ़ जैसे एजुकेशन और नाइटलाइफ हब में पढ़ने वाले छात्र तेजी से इसकी गिरफ्त में आ रहे हैं। आलम यह है कि युवाओं में अब कॉफी से ज्यादा क्रेज हुक्के का हो गया है।
भ्रम वर्सेस हकीकतः पीजीआई विशेषज्ञ ने खोला राज
पीजीआई के स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ से जुड़े विशेषज्ञ डॉ. सोनू गोयल ने युवाओं के सबसे बड़े भ्रम को दूर किया हैः
भ्रमः हुक्के का पानी निकोटीन और जहर को फिल्टर कर देता है।
हकीकतः पानी धुएं को साफ नहीं करता, सिर्फ ठंडा करता है ताकि वह गले में कम चुभने पाए। असल में निकोटीन, टार और हैवी मेंटल्स सीधे फेफड़ों तक पहुंचती हैं।
200 गुना ज्यादा धुओः हुक्के का धुआं सिगरेट के मुकाबले 200 गुना तक ज्यादा मात्रा में फेफड़ों में पहुंचता है और शरीर में कार्बन मोनोऑक्साइड का स्तर 3 से 9 गुना तक बढ़ा देता है। किशोरों का दिमाग निकोटीन के प्रति संवेदनशील होने के कारण वे कभी-कभार की पार्टी से शुरू कर जल्द ही इसके आदी हो जाते हैं।
सिर्फ फेफड़े नहीं, दिल-दिमाग भी रिस्क पर
अंगों पर असरः हुक्के से फेफड़ों की क्षमता घटती है, हार्ट अटैक व हाई बीपी का खतरा बढ़ता है और युवाओं का जिम व खेल परफॉर्मेंस प्रभाषित होता है।
मानसिक असरः युवाओं में एंग्जायटी और निकोटीन डिपेंडेंसी तेजी से बढ़ रही है। लंबे समय में यह फेफड़ों के कैन्सर, सीओपीडी और दिल की गंभीर चीमारियों का कारण बन रहा है।
माउथपीस शेयरिंग से इन्फेक्शनः दोस्तों के बीच एक ही हुक्का माउथपीस शेयर कारने से टीबी, वायरल इन्फेक्शन, हपीज और सांस की बीमारियां तेजी से फैल रही हैं। चंडीगढ़ और पंजाब पहले से ही टीबी से जूझ रहे हैं, ऐसे में यह ट्रेंड हेल्थ इमरजेंसी बन रहा है।
हर्बल का झांसा, अंदर वही जहर
कैफे लाउंज युवाओं को आकर्षित करने के लिए मिंट, ब्लूबेरी, वॉटरमेलन और चॉकलेट जैसे पलेवर को हर्बल और निकोटीन-फ्री बताकर बेच रहे हैं, जो सिर्फ एक मार्केटिंग ट्रिक है।
डब्ल्यूएचओ का आंकड़ा करीब 89% युवा सिर्फ फ्लेवर के लालच में पहली बार हुक्का ट्राई करते हैं।
चारकोल का खतरा : हुक्के में चारकोल जलने से भारी मात्रा में कार्बन मोनोऑक्साइड निकलती है।
दावे फेरलः निकोटीन फ्री के दालों के बावजूद जांच में कई उत्पादों में तय सीमा से ज्यादा निकोटीन मिला है। टार और कैंसरकारी रसायन लगातार शरीर में जाते हैं।





