मुर्गियों का टीकाकरण कलेण्डर

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                                 डॉ. सोनिका ग्रेवाल

मुर्गीपालन 2 प्रकार से किया जाता हैं| जो मुर्गियाँ अंडो के उत्पादन के लिए पाली जाती हैं उनको “लेयर्स” तथा जो मुर्गियाँ मांस के उत्पादन के लिए पाली जाती हैं उनको “ब्रोयलर्स” कहते हैं| विश्व मे सर्वाधिक अंडे देने वाली मुर्गी की नस्ल “लेगहॉर्न” हैं| मुर्गीपालक ये ध्यान रखे कि मुर्गियों मे रोग-प्रकोप बहुत तेजी से फैलता है और फिर नियंत्रण पाना कठिन हो जाता हैं अतः समय पर टिकाकरण करवाना आवश्यक होता हैं| ‘लेयर्स’ तथा ‘ब्रोयलर्स’ का टिकाकरण निम्नानुसार करवाना चाहिए-

“ब्रोयलर्स” मुर्गियों के लिए टीकाकरण-कलेण्डर

बीमारी उम्र टीकाकरण करने का तरीका
मारेक्स रोग 1 दिन चमड़ी मे लगाया जाता हैं
रानीखेत (एफ-स्ट्रेन) 1 सप्ताह नाक या आँख में ड्रॉप डालकर
गमबोरो रोग 2-3 सप्ताह आँख द्वारा/पीने के पानी में डालकर
रानीखेत (एफ-स्ट्रेन का बूस्टर डोज़) 4-5 सप्ताह नाक या आँख में ड्रॉप डालकर

 

“लेयर्स” मुर्गियों के लिए टीकाकरण-कलेण्डर

बीमारी उम्र टीकाकरण करने का तरीका
मारेक्स रोग 1 दिन नाक/आँख में ड्रॉप डालकर
रानीखेत (एफ-स्ट्रेन) 1 सप्ताह नाक/आँख में ड्रॉप डालकर
गमबोरो रोग 2-3 सप्ताह आँख द्वारा/पीने के पानी में डालकर
संक्रमित ब्रोंकाइटिस 4 सप्ताह आँख द्वारा/पीने के पानी में डालकर
रानीखेत (एफ-स्ट्रेन का बूस्टर डोज़) 5-6 सप्ताह आँख द्वारा/पीने के पानी में डालकर
रानीखेत (आर2बी- स्ट्रेन) 8-9 सप्ताह चमड़ी मे लगाया जाता हैं
मुर्गी पोक्स 10-11 सप्ताह खरोंच कर
संक्रमित ब्रोंकाइटिस (बूस्टर डोज़) 14-16 सप्ताह आँख द्वारा/पीने के पानी में डालकर
मुर्गी पोक्स (बूस्टर डोज़) 16-17 सप्ताह खरोंच कर
रानीखेत (आर2बी- स्ट्रेन का बूस्टर) 18 सप्ताह चमड़ी मे लगाया जाता हैं
गमबोरो रोग (बूस्टर डोज़) 18-20 सप्ताह पीने के पानी में डालकर

 

‘लेयर्स’ मुर्गियों मे अगर जरूरत हो या रोग-प्रकोप फैला हो तो ‘संक्रमित-कोराईजा’ एवं ‘मुर्गी-कोलेरा’ रोगो से बचाव के लिए 8 सप्ताह की उम्र मे मुर्गियों का टिकाकरण करके 12 सप्ताह की उम्र में इनकी बूस्टर डोज़ लगा दी जाती हैं| जबकि स्पाईरोकीटोसिस रोग से बचाव 6 सप्ताह और “एग-ड्रॉप-सिंड्रोम” से बचाव हेतु 18 सप्ताह की उम्र मे मुर्गियों का टिकाकरण कर दिया जाता हैं|

मुर्गियों की भारतीय नस्ले:-

  • कड़कनाथ:- इसे काली मासी भी कहा जाता हैं, क्योंकि ये नस्ल अपने काले माँस के लिए प्रसिद्ध हैं| इसका मूल निवास स्थान झाबुआ जिला माना गया हैं अतः अभी हाल ही मे मध्यप्रदेश को इसका “जीआई-टैग” दिया गया हैं| इसके माँस में उच्च प्रोटीन तथा निम्न फैट व कॉलेस्ट्रोल लेवल पाये जाते हैं| इसके माँस के काफी औषधीय उपयोग भी होते हैं|
  • असील:- ये नस्ल “मुर्गो की लड़ाई” खेल मे काफी लोकप्रिय नस्ल हैं| लंबी व मजबूत टांगे इसकी चाल को शानदार बनती हैं| यह मुख्यतया पश्चिम-बंगाल, उड़ीसा तथा आन्ध्रप्रदेश मे पाया जाता हैं|
  • अंकलेश्वर:- गुजरात के अंकलेश्वर मे उत्पन्न इस नस्ल की कलंगी इकहरी तथा सुर्ख लाल रंग की होती हैं| ये आदिवासियों के द्वारा बिना टिकाकरण और दवाइयों के पाली जाती हैं|
  • पंजाब-भूरा:- पंजाब हरयाणा मे उत्पन्न होने और पंखो का भूरा रंग होने के कारण इसको पंजाब-भूरा नस्ल कहते हैं| नर मुर्गे की गर्दन, पंख तथा पूछ पर काली धारियाँ पायी जाती हैं| जबकि कलंगी लाल इकहरी और खड़ी होती हैं|

भारत मे देशी और विदेशी जर्म-प्लाज्म की मदद की मुर्गियों की 4 नस्ले विकसित की गयी हैं, जिनका नाम प्रतापधन, कामरुपा, झारसीम और नर्मदानिधि हैं|

राजस्थान की “प्रतापधन नस्ल” की विशेषतायें- ये बहुरंगी होती हैं| इसकी लंबी टांगे होने से शत्रुओ से आसानी से बचाव कर लेती हैं| ग्रामीण क्षेत्रों में आसानी से पाली जा सकती हैं| इसके अंडे का रंग हल्का भूरा होता हैं| ये लगभग 161 अंडे प्रतिवर्ष देती हैं|

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