‘पहले इस्तेमाल करे फिर विश्वास करे’ की स्थिति के शिकंजे में राजनीतिक दल

राजनीतिक दलों ने लगाए जिताऊ नेताओं पर दांव

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प्रदेश में चुनावी ब्यार बह रही है हर कोई बहती गंगा में हाथ धोने को आतुर है। राजनीतिक दल अपनी रीति निति को तिलांजली देकर सिर्फ सत्ता का सुख भोगने के लिए भागम भाग में लगे है। कोंग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रदेश की रैलियों में पैराशूट उम्मीदवारों की डोर काटने की बात कह गए थे। वो डोरिया काट तो नहीं पाए लेकिन इन डोरियों में वो भी उलझ कर रह गए। दूसरी तरफ कार्यकर्ताओ की पार्टी कहलाने वाली अनुशासित पार्टी ‘ चट मंगनी और पट शादी ‘ करने में लगी हुई है। भाजपा तो ‘पहले इस्तेमाल करे फिर विश्वास करे’ की तर्ज पर लोगो के टिकट पहले दे रही है और पार्टी की सदस्यता बाद में दे रही है। जनचर्चाओ में ये बात भी आ रही है कि राजनीतिक दल जिताऊ, टिकाऊ उमीदवारो को टिकट देने के साथ कुछ ‘कमाऊ’ उम्मीदवारों को भी टिकट देने के लिए कमर कस चुके है। और राजनीतिक दल ऐसा करे भी क्यों नहीं क्योकि एक दिन की सिकंदर जनता के बीच से वो सब मुद्दे गायब है। जो पीड़ा उन्होंने भोगी थी। वर्तमान राजनीति में जनता जनार्दन सुधार तो चाहती है लेकिन वो इसके लिए किम्मत चुकाने के लिए तैयार नहीं है। हर कोई अपनी जाति धर्म के उम्मीदवार तक सिमट चूका है। जनता का हर आदमी अब सोचने लगा है की अपना काम बनता भाड़ में जाये जनता। जब जनता के हर आदमी की सोच ये हो चुकी है तो उसमे जो वास्तविक मुद्दे वो कही नेपथ्य में जा रहे है। लोकतंत्र के मंदिरो में जाकर वंशवाद से निकली इन मुर्तियो की प्राण प्रतिष्ठा होगी। और लोकतंत्र की रक्षा करने की जिम्मेवारी हम वंशवाद के कुलदीपको को सौप रहे है। क्यों न हमारे देश में भी संयुक्त राज्य अमेरिका की तर्ज पर दो बार से अधिक चुनाव जितने वाले लोगो पर रोक लगाने का नियम बने। जिससे बहुत सारी वंशवाद जैसी समस्याए अपने आप सुलझ जाएगी साथ ही इससे भ्रस्टाचार को रोकने में भी मदद मिलेगी। हमारे देश में एक बार भी विधायक जैसे चुनाव जीत जाता है तो उसके साथ उसकी आने वाली पुस्तो का भी इंतजाम हो जाता है। वही अमेरिका का राष्ट्रपति अपना कार्यकाल पूरा करने के बाद भी एक साधारण नागरिक की तरह अपना जीवन व्यतीत करता है।

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