Archive Notice: This article was originally published on 10 दिसम्बर 2021.
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(लेखक लम्बे समय से पशुपालको में पशुरोगों के लिए जागरूकता अभियान चला रहे है, सोशल मीडिया पर भी पशुपालको को जागरूक करने हेतु लेख लिखते रहते हैं)

सीकर, हर बार सर्दियों में दुधारू पशुओं में थनैला रोग के केस बढ़ जाते हैं। अतः समय पर थनैला रोग की पहचान और उपचार शुरू करना बेहद आवश्यक हो जाता हैं। उससे भी महत्वपूर्ण इससे बचाव के उपायों को जानना होता हैं। तो आइए थनैला रोग के बारे में जानते हैं- दुधारू पशुओ के थन में सूजन आना, थन लाल होना, कडापन और उनमें दर्द होना “थनैला” रोग के प्रमुख लक्षण होते हैं| थनैला रोग के अलग अलग प्रकार होते है जैसे- अतितीव्र, तीव्र, कम तीव्र और दीर्घकालीन| ध्यान देने योग्य बात हैं कि थनैला रोग में थन सूजे हुए, गर्म, सख्त और दर्ददायी हो जाते हैं| थनों से फटा हुआ, थक्के युक्त अथवा दही की तरह जमा हुआ दूध निकलता हैं| कभी कभी दूध के साथ रक्त भी निकलता हैं| दूध गन्दला और पीले-भूरे रंग का हो जाता हैं| दूध से दुर्गन्ध आने लगती है| कभी कभी थनों में गांठे पड जाती हैं, एवं थन आकार में छोटे भी हो सकते हैं| दूध की मात्रा कम हो जाती है| पशु को बुखार आता हैं| पशु खाना पीना कम कर देता हैं|

थनैला रोग का कारण:-
विषाणु, जीवाणु, माईकोप्लाज्मा अथवा कवक के द्वारा होता हैं
संक्रमित पशु के संपर्क में आने से
दूध दुहने वाले के गंदे हाथों से
पशुओ के गंदे आवास
अप्रर्याप्त और अनियमित रूप से दूध दुहने
खुरदरा फर्श
थन में चोट लगने, संक्रमण होने के कारण

थनैला रोग के पहचान हेतु जाँच:- 1) स्ट्रिप कप टेस्ट 2) कैलिफ़ोर्निया मेसटाइटीस टेस्ट
थनैला रोग से बचाव के उपाय:- पशुओ के आवास में मक्खियाँ नही होनी चाहिए| पशुओं के आवास के साफ एवं स्वच्छ रखे| फिनाइल से सफाई करे| दूध दुहने से पहले हाथ साफ करे और साफ बर्तन में ही दूध निकाले| दूध दुहने से पूर्व तथा बाद में 1{44d7e8a5cbfd7fbf50b2f42071b88e8c5c0364c8b0c9ec50d635256cec1b7b56} लाल दवा के घोल से थन साफ़ करना भी अच्छा रहता है| दूध दुहने के बाद कुछ समय तक पशु को बैठने नही देवें ताकि उनके छिद्रों में से थन में संक्रमण ना जा सके। दुधारू पशुओं का दूध सूख जाने पर उनके थन में प्रतिजैविक उपचार करने पर अगले ब्यात तक थनैला की सम्भावना कम हो जाती हैं| दूध सही विधि से निकाला जाना चाहिए| थन में घाव हो जाने पर तुरंत उपचार करवाए| थनैला रोग के लक्षण दिखाई देते ही तुरंत वेटरनरी डॉक्टर से उपचार करवाए अन्यथा थन ख़राब हो जाने से पशुपालक को आर्थिक हानि उठानी पड़ती हैं|

पशुपालक सलाह :- रवि कुमार तक्षक ने पिछले दिनों आयोजित हुई पशुपालक गोष्ठी का जिक्र किया जिसमें धर्मेंद्र शर्मा ने भी अच्छा सहयोग दिया। गोष्ठी में पशुपालको ने मौसम में बदलाव होते ही पशुओं के कम चारा पानी खाने की शिकायत की तो उन्हें “फास्टून बोलस” देने की सलाह दी गयी और मौसम के बदलाव को देखते हुए एक बार वेटरनरी डॉक्टर की सलाह से “बुदसूवेट बोलस” ‘मेविल बोलस’ एवम ‘वेटसिप-3 बोलस’ देने हेतु भी बताया गया। जूं-चिचड़ो से बचाव हेतु सावधानीपूर्वक ‘निलटिक लिक्विड’ स्प्रे करने की विधि बताई गई। मुहँपका खुरपका रोग के मामलों में पांवों के घावों पर ‘ए-3’ स्प्रे के अच्छे परिणामों से अवगत करवाया गया। दूध उतारने में दिक्कत होने पर ‘दूध-एक्स बोलस और लिक्विड’ के परिणाम शानदार रहते हैं। दस्त में ‘वेटसिप-टीजेड बोलस’ और ‘क्यूइक स्पास’ देने हेतु कहा गया। पशुओं को शीत लहर से बचाने के उपाय भी बताए गए।

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