Archive Notice: This article was originally published on 20 फ़रवरी 2026.
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शिकायत की जांच के बजाय आवेदक से ही मांग रहे सबूत! आरटीआई एक्टिविस्ट ने लगाया बड़ा आरोप, जाँच का विषय

झुंझुनू, झुंझुनू में आरटीआई अधिनियम को फुटबाल बनाने का आरोप एक आरटीआई एक्टिविस्ट द्वारा लगाया गया है। आरटीआई एक्टिविस्ट अशोक कुमार मोदी ने प्रेस नोट जारी कर यह बड़ा आरोप लगाया है। मामले की जानकारी देने से पहले आपको बता दे कि झुंझुनू जिले में लगातार आरटीआई कानून के साथ खिलवाड़ करने के आरोप लम्बे समय से लगते आ रहे है। वही बता दे कि पिछले कुछ महीनो पूर्व मानवाधिकर आयोग भारत सरकार के विशेष मॉनिटर बाल कृष्ण गोयल झुंझुनू दौरे पर आए थे। जिला प्रशासन के साथ बैठक के दौरान उन्होंने जिला प्रशासन को सख्त निर्देश दिए थे कि हर सरकारी कार्यालय में आरटीआई के लोक सूचना अधिकारी और अपीलीय अधिकारी से सम्बन्धित सभी जरुरी जानकारी सार्वजनिक रूप से बोर्ड लगाकर साथ ही सिटीजन चार्टर भी हर सरकारी कार्यालय को प्रदर्शित करने के निर्देश दिए थे और इसकी पालना 15 दिवस में करने के निर्देश दिए गए थे। लेकिन झुंझुनू प्रशासन ने आज तक इन निर्देशों की पालना नहीं की है। लिहाजा सरकारी कार्यालयों में ही आरटीआई कानून को हलके में लिया जा रहा है। वहा पर जो निजी संस्थान इस कानून के दायरे में आते है वह कितनी पालना करते होंगे इसका अंदाजा भी सहज ही लगाया जा सकता है।

अब आते है मूल बिंदु पर जिसमे आरटीआई एक्टिविस्ट अशोक कुमार मोदी ने प्रेस नोट में यह लिखा है कि — एक भ्रष्टाचार उजागर करने के लिए बनाए गए आरटीआई एक्ट को ही अधिकारी ही फुटबॉल बना रहे हैं। ताजा मामला शहर की सैकड़ों वर्ष पुरानी श्री गोपाल गौशाला से जुड़ा हुआ है, जहां अनियमितताओं, भ्रष्टाचार और गोवंश की मृत्यु के मामलों को लेकर आरटीआई एक्टिविस्ट अशोक कुमार मोदी ने जिला कलेक्टर से जांच की मांग की थी।
जिला कलेक्टर कार्यालय द्वारा पशुपालन विभाग को जांच के निर्देश दिए गए, लेकिन विभाग ने स्वयं जांच करने के बजाय आवेदक को ही ईमेल के माध्यम से सबूत सहित कार्यालय में उपस्थित होने का निर्देश जारी कर दिया। इससे यह सवाल खड़ा हो गया है कि जब शिकायत दर्ज हो चुकी है तो जांच करना विभाग की जिम्मेदारी है या शिकायतकर्ता की ?

आरटीआई एक्टिविस्ट अशोक कुमार मोदी का कहना है कि उन्होंने गौशाला में अनियमितताओं, गोवंश की मृत्यु के उचित निस्तारण में लापरवाही तथा कार्यकारिणी के समय पर चुनाव नहीं कराने जैसे गंभीर मुद्दों को उजागर करते हुए शिकायत की थी। इसके बावजूद संबंधित विभाग स्वयं मौके पर जांच करने के बजाय आवेदक को ही सबूत प्रस्तुत करने के लिए कार्यालय बुला रहा है, जिससे जांच प्रक्रिया पर संदेह उत्पन्न हो रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि जांच को ठंडे बस्ते में डालने के उद्देश्य से मामले को फुटबॉल बनाकर जिम्मेदारी से बचने का प्रयास किया जा रहा है। विभागीय अधिकारियों की इस कार्यशैली से भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने की बजाय उसे संरक्षण मिलने की आशंका प्रबल हो रही है।

ज्ञात रहे कि कुछ समय पूर्व गौशाला में अनियमितताओं और गोवंश से जुड़े मुद्दों को लेकर गौ रक्षक दल ने गौशाला के बाहर धरना-प्रदर्शन भी किया था। उस दौरान पहुंचे उच्च अधिकारियों ने निष्पक्ष और पूर्ण जांच का आश्वासन देकर धरना समाप्त करवाया था। साथ ही पिछले पांच वर्षों से कार्यरत कार्यकारिणी के तीनों पदाधिकारियों ने अपने पदों से इस्तीफा भी दे दिया था, लेकिन इसके बावजूद वर्तमान में वही कार्यकारिणी पुनः कार्यरत है, जिससे विवाद और गहरा गया है।

इस पूरे घटनाक्रम के दौरान फतेहपुर स्थित बुद्धगिरी मढ़ी के महंत दिनेश गिरी ने प्रदर्शनकारियों और गौशाला कार्य समिति के बीच मध्यस्थता कर समाधान का प्रयास भी किया था। बावजूद इसके अब तक ठोस कार्रवाई नहीं होने से गौभक्तों और आमजन में आक्रोश व्याप्त है। ऐसे में आरटीआई एक्टिविस्ट ने जिला कलेक्टर से मांग की है कि आस्था और सनातन परंपरा की धरोहर श्री गोपाल गौशाला में हो रही अनियमितताओं और भ्रष्टाचार की जांच किसी निष्पक्ष व उच्च अधिकारी से करवाई जाए, ताकि सच्चाई सामने आ सके, दोषियों पर सख्त कार्रवाई हो और गौवंश की समुचित देखभाल सुनिश्चित हो सके।

एक्टिविस्ट मोदी का कहना है –
जिला कलेक्टर को गौशाला में हो रही गड़बड़ियों की जानकारी देकर जांच की गुहार लगाई थी, लेकिन अभी तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। पशुपालन विभाग में आरटीआई के तहत सूचना मांगी गई थी, उसका जवाब देने के बजाय मुझसे ही सबूत मांगे जा रहे हैं। यदि विभाग आरटीआई के तहत मांगी गई सूचनाएं उपलब्ध करवाता है, तो उन्हीं दस्तावेजों में गड़बड़ियों के सबूत स्वतः सामने आ जाएंगे।

आरटीआई एक्टिविस्ट मोदी द्वारा जारी किए गए प्रेस नोट को हमने आपके साथ सांझा किया है यदि उनके द्वारा लगाए गए आरोपों में सच्चाई है तो यह गंभीर मामला है और जांच का विषय भी है।

वही झुंझुनू में आरटीआई को लेकर सवाल कोई पहली बार खड़ा नहीं हुआ है इससे पहले भी गंभीर अनियमिताओं के सवाल आरटीआई कानून को लेकर प्रशासन में बैठे अधिकारियों पर लगते आए हैं और मानवाधिकार आयोग के विशेष मॉनिटर जिनके निर्देशों की पालना 15 दिन में जिला प्रशासन को करनी थी वहा महीनो गुजरने के बाद भी पालना नहीं हो पाती है तो कहीं ना कहीं झुंझुनू में आरटीआई कानून और सिटीजन चार्टर जैसे मामलों की स्थिति काफी चिंताजनक है। वही इस मामले से जुड़े जो पक्षकार है वह भी अपना पक्ष रखना चाहे हो तो हम निस्संकोच उनका पक्ष भी प्रकाशित करेंगे।

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