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प्रेम और देशप्रेम के अहसास को गहरे अर्थों में उतार पाना सहज और सरल नहीं है। रेखा भाटिया के पास गहरी अनुभूतियां हैं और शब्दों का सरल प्रवाह है, जिससे वे अपनी कविता को व्यापक अर्थ तक ले जाती हैं। रेखा भाटिया ने अपनी कविताओं में जहां प्रेम, अध्यात्म, देशभक्ति, आतंकवाद, महिला सशक्तिकरण, बेरोजगारी और राजनीतिक मुद्दों को बेहद संवेदनशीलता के साथ अभिव्यक्त किया है, वहीं आम आदमी की पीड़ा को बड़ी सहजता के साथ शब्द देने में वे सफल रहीं हैं। इस काव्य संग्रह की कविताओं में उनकी लंबी संघर्ष यात्रा का अहम योगदान है। क्या रोक पाओगे यह खेल, हवाओं का रुख, मेरी भारत माता, मां मैं हूं तेरा, चलो गांव लौट चलें, मन खिल जाने दो, एक भारत यहां भी है बसा, मेरे अश्रु नहीं बेमोल, हठधर्मिता, इंसान खिलाफ इंसान के, मेरा मन समुन्दर बना, प्रकृति से छुपा लूं बसंत बहार, अदा बदलती है जीवन की, कशिश तेरे मेरे बीच, मां की दुनिया, वक्त का सबक, बड़ी खिड़कियां और एक शहर, तेरे आंचल के साये में आदि रचनाओं को पढ़कर मन भाव विभोर हो गया।
इस खूबसूरत पुस्तक की सफलता में प्रसिद्ध साहित्यकार और संपादक डॉ. सुधा ओम ढींगरा का भी विशेष योगदान रहा है। अभी हाल ही में साहित्यकार रेखा भाटिया की दूसरी पुस्तक “मन की नदी से भीगे शब्द” का भी विमोचन हुआ है। आदर्श समाज समिति इंडिया द्वारा 2023 में साहित्य का राष्ट्रीय पुरस्कार “गाँधी सेवा रत्न अवॉर्ड” साहित्यकार रेखा भाटिया को देने पर विचार किया जा रहा है। इसी संदर्भ में उनकी रचनाओं व पुस्तकों का अवलोकन किया जा रहा है।
