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आशा देवी आर्यनायकम जयंती: पहली पद्मश्री गांधीवादी नारी

Asha Devi Aryanayakam Gandhian freedom fighter portrait memorial

पहली महिला पद्मश्री विजेता, नई तालीम की सशक्त स्तंभ

जयंती विशेष | 1 जनवरी लेखक- धर्मपाल गाँधी

हिन्द की क्रांतिकारी बेटी आशा देवी आर्यनायकम का जन्म 1 जनवरी 1901 को तत्कालीन ब्रिटिश भारत के लाहौर में हुआ। वे स्वतंत्रता सेनानी, समाज सुधारक, शिक्षाविद् और गांधीवादी विचारधारा की सशक्त प्रतिनिधि थीं।

शिक्षा से स्वतंत्रता का सपना

आशा देवी का मानना था कि शिक्षा के बिना स्वतंत्रता अधूरी है। उन्होंने विद्यार्थियों के लिए नई तालीम (बुनियादी शिक्षा) को अपनाया, जिसमें ज्ञान, श्रम और नैतिकता का समन्वय था।
वे कहती थीं कि शिक्षा बोझ नहीं, जीवन को आत्मनिर्भर बनाने का माध्यम होनी चाहिए।

शांतिनिकेतन से सेवाग्राम तक

आशा देवी का जीवन रवींद्रनाथ टैगोर के शांतिनिकेतन, महात्मा गांधी के सेवाग्राम और विनोबा भावे के भूदान आंदोलन से गहराई से जुड़ा रहा।
शांतिनिकेतन में वे विद्यार्थियों की प्रिय ‘दीदी’ के रूप में जानी गईं।

स्वतंत्रता आंदोलन में भूमिका

स्वाधीनता संग्राम के दौरान आशा देवी ने समाज सेवा, शिक्षा और महिला सशक्तिकरण को अपना हथियार बनाया। गांधी जी के साथ रहते हुए वे नई तालीम की मुख्य स्तंभ बनीं।
1937 के वर्धा शिक्षा सम्मेलन में उनकी भूमिका उल्लेखनीय रही।

पहली महिला पद्मश्री

देश सेवा के लिए भारत सरकार ने 1954 में आशा देवी आर्यनायकम को पद्मश्री से सम्मानित किया।
वे पद्मश्री पाने वाली पहली महिला थीं—यह उपलब्धि भारतीय नारी शक्ति का प्रतीक बनी।

फरीदाबाद बसाने में योगदान

देश विभाजन के बाद आशा देवी ने पं. जवाहरलाल नेहरू के साथ मिलकर फरीदाबाद में विस्थापितों के पुनर्वास में अहम भूमिका निभाई।
उन्होंने स्कूल खोले, रोजगार सृजन किया और मानवता की मिसाल पेश की।

साहित्यिक कृतियाँ

आशा देवी ने दो महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखीं

  • “The Teacher: Gandhi”
  • “Shanti Sena: Die Indische Friedenswehr”
    इन कृतियों में गांधी दर्शन की जीवंत झलक मिलती है।

अंतिम विदाई

30 जून 1972 को उन्होंने दुनिया को अलविदा कहा। मानवता, शिक्षा और शांति के लिए समर्पित उनका जीवन आज भी प्रेरणा स्रोत है।

शेखावाटी/राजस्थान के युवाओं के लिए आशा देवी आर्यनायकम का जीवन संदेश देता है कि शिक्षा और सेवा से ही समाज बदला जा सकता है।