थाईलैंड में चूरू के डॉ. मूलचन्द को मिला ‘अंतर्राष्ट्रीय संस्कृत रत्न सम्मान
चूरू, थाईलैंड के बैंकॉक स्थित शिल्पकोर्न विश्वविद्यालय परिसर में भारत सरकार के संस्कृत अध्ययन केंद्र और ग्लोबल संस्कृत फोरम, भारत के संयुक्त तत्वावधान में 28 से 30 सितंबर 2026 तक पांचवीं अंतर्राष्ट्रीय ग्लोबल संस्कृत संगोष्ठी आयोजित की गई।
संगोष्ठी का विषय ‘Indian Knowledge Systems: Bridging Cultures and Knowledge Traditions’ रहा। तीन दिवसीय इस आयोजन में देश-विदेश के लगभग 300 शोध पत्र ऑफलाइन और ऑनलाइन माध्यम से प्रस्तुत किए गए।
कार्यक्रम में भारत के राजदूत पुनीत अग्रवाल मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे, जबकि अंतर्राष्ट्रीय सचिव डॉ. राजेश मिश्रा ने प्रतिभागियों और अतिथियों का स्वागत किया।
नागेशभट्ट के काव्यशास्त्रीय योगदान पर प्रस्तुत किया शोध पत्र
तारानगर स्थित मां जालपा देवी राजकीय महाविद्यालय के प्राचार्य प्रोफेसर (डॉ.) मूलचन्द ने संगोष्ठी में ‘भारतीय ज्ञान परंपरा के आलोक में नागेशभट्ट का काव्यशास्त्रीय योगदान’ विषय पर अपना शोध पत्र प्रस्तुत किया।
उन्होंने अपने शोध में बताया कि नागेशभट्ट को केवल व्याकरणाचार्य के रूप में देखना उनके बहुआयामी व्यक्तित्व का पूर्ण मूल्यांकन नहीं है। नागेशभट्ट ने काव्यशास्त्र, अलंकारशास्त्र और धर्मशास्त्र जैसे विषयों पर अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथों और टिप्पणियों की रचना की, जो भारतीय ज्ञान परंपरा की समृद्धि को दर्शाती है।
डॉ. मूलचन्द ने कहा कि नागेशभट्ट का साहित्य भारतीय ज्ञान परंपरा और वैश्विक ज्ञानधारा के बीच एक महत्वपूर्ण सेतु का कार्य करता है तथा आधुनिक शोध की दृष्टि से उनके ग्रंथों का पुनर्मूल्यांकन अत्यंत आवश्यक है।
‘अंतर्राष्ट्रीय संस्कृत रत्न सम्मान’ से हुए सम्मानित
संस्कृत और भारतीय संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन में उल्लेखनीय योगदान के लिए प्रोफेसर (डॉ.) मूलचन्द को ‘अंतर्राष्ट्रीय संस्कृत रत्न सम्मान’ से सम्मानित किया गया।
यह उनके लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्राप्त तीसरा प्रतिष्ठित सम्मान है। इससे पहले उन्हें ‘संस्कृत महामहोपाध्याय’ उपाधि से सम्मानित किया जा चुका है। साथ ही राजस्थान सरकार द्वारा भी उन्हें ‘संस्कृत साधना सम्मान’ प्रदान किया गया था।
चूरू और तारानगर क्षेत्र में खुशी की लहर
डॉ. मूलचन्द को मिले इस सम्मान पर महाविद्यालय के संकाय सदस्यों, संस्कृत विद्वानों और शिक्षाविदों ने उन्हें बधाई दी।
तारानगर और चूरू क्षेत्र में इस उपलब्धि को लेकर हर्ष का माहौल है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह सम्मान केवल डॉ. मूलचन्द की व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि राजस्थान और भारतीय संस्कृत जगत के लिए भी गौरव का विषय है।
यह उपलब्धि दर्शाती है कि भारतीय ज्ञान परंपरा और संस्कृत विद्या आज भी वैश्विक स्तर पर अपनी प्रासंगिकता और गरिमा बनाए हुए हैं।






