चूरू। राजस्थान की शौर्य परंपरा में शेखावाटी का नाम हमेशा गर्व से लिया जाता है। इसी धरती ने भारतीय सेना को कई वीर सैनिक और सैन्य अधिकारी दिए। इनमें लेफ्टिनेंट जनरल सगत सिंह राठौड़ का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
द्वितीय विश्व युद्ध से लेकर गोवा मुक्ति अभियान, नाथुला की लड़ाई और 1971 के भारत-पाक युद्ध तक उनके सैन्य जीवन में कई महत्वपूर्ण अध्याय जुड़े रहे। 22 अप्रैल 2026 को चूरू में उनकी प्रतिमा के अनावरण के दौरान लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने भी उनके साहस, नेतृत्व और राष्ट्रसेवा को याद किया तथा गोवा, नाथुला और 1971 के युद्ध में उनकी भूमिका का उल्लेख किया।
कुसुमदेसर में हुआ था जन्म
लेफ्टिनेंट जनरल सगत सिंह राठौड़ का जन्म 14 जुलाई 1919 को चूरू जिले के कुसुमदेसर गांव में हुआ था। उन्होंने बीकानेर के डूंगर कॉलेज से शिक्षा प्राप्त की और इसके बाद बीकानेर स्टेट फोर्स में सैन्य जीवन की शुरुआत की।
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने अधिकारी के रूप में सेवाएं दीं। सैन्य जीवन में आगे बढ़ते हुए उन्होंने अलग-अलग महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं और अपनी निर्णय क्षमता, नेतृत्व और युद्ध कौशल के लिए पहचान बनाई।
गोवा मुक्ति अभियान में निभाई महत्वपूर्ण भूमिका
भारत की आजादी के बाद भी गोवा पुर्तगाली शासन के अधीन था। 1961 के गोवा मुक्ति अभियान में ब्रिगेडियर सगत सिंह ने महत्वपूर्ण सैन्य भूमिका निभाई।
ऑपरेशन विजय के दौरान भारतीय सेना ने गोवा में सैन्य कार्रवाई की और 19 दिसंबर 1961 को पुर्तगाली शासन का अंत हुआ। चूरू में अप्रैल 2026 में उनकी प्रतिमा के अनावरण के अवसर पर भी उनके गोवा मुक्ति अभियान में योगदान को विशेष रूप से याद किया गया।
नाथुला में चीन के सामने डटे रहे
इसके बाद सगत सिंह ने सिक्किम में 17 माउंटेन डिवीजन की कमान संभाली। वर्ष 1967 में नाथुला में भारत और चीन के सैनिकों के बीच संघर्ष हुआ।
सगत सिंह के नेतृत्व में भारतीय सेना ने नाथुला क्षेत्र में अपनी स्थिति मजबूती से बनाए रखी। इस संघर्ष को भारतीय सैन्य इतिहास में महत्वपूर्ण घटनाओं में गिना जाता है। बाद में सगत सिंह को उनकी विशिष्ट सेवाओं के लिए परम विशिष्ट सेवा पदक (PVSM) से सम्मानित किया गया।
1971 के युद्ध में 4 कोर की कमान
सगत सिंह के सैन्य जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय 1971 का भारत-पाक युद्ध और बांग्लादेश मुक्ति संग्राम माना जाता है।
उस समय वे 4 कोर के कमांडर थे। पूर्वी पाकिस्तान में भारतीय सेना के अभियान के दौरान नदियों और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद सैन्य अभियान को तेजी से आगे बढ़ाया गया।
मेघना नदी को पार करने के लिए हेलीकॉप्टरों के जरिए सैनिकों की आवाजाही इस अभियान का महत्वपूर्ण हिस्सा रही। भारतीय सेना की इस रणनीति ने पूर्वी पाकिस्तान में अभियान की गति बनाए रखने में मदद की।
16 दिसंबर 1971 को ढाका में पाकिस्तानी सेना ने आत्मसमर्पण किया और इसके बाद बांग्लादेश का गठन हुआ। चूरू में अप्रैल 2026 में उनकी प्रतिमा के अनावरण के दौरान लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने भी 1971 के युद्ध में ढाका में पाकिस्तानी सेना के आत्मसमर्पण से जुड़े उनके योगदान को रेखांकित किया।
सैन्य सेवा के लिए मिले बड़े सम्मान
सगत सिंह को उनकी सैन्य सेवाओं के लिए परम विशिष्ट सेवा पदक (PVSM) से सम्मानित किया गया। उन्हें बाद में पद्म भूषण से भी सम्मानित किया गया। सरकारी रिकॉर्ड और रक्षा मंत्रालय से जुड़े प्रकाशनों में भी उनके 1971 के युद्ध में योगदान तथा पद्म भूषण का उल्लेख मिलता है।
उनकी सैन्य विरासत का उल्लेख आज भी भारतीय सैन्य इतिहास में किया जाता है। चूरू में अप्रैल 2026 में उनकी प्रतिमा का अनावरण किया गया, जिसमें लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला, राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा और अन्य गणमान्य लोग शामिल हुए।
26 सितंबर को पुण्यतिथि, चूरू में स्मृतियां कायम
लेफ्टिनेंट जनरल सगत सिंह राठौड़ का 26 सितंबर 2001 को निधन हुआ। उन्होंने दिसंबर 1974 में सैन्य सेवा से सेवानिवृत्ति के बाद जयपुर को अपना निवास बनाया था।
आज उनके पैतृक गांव कुसुमदेसर में उनकी स्मृति से जुड़ा स्मारक है। चूरू जिला मुख्यालय पर भी उनकी प्रतिमा स्थापित की गई है। इस तरह चूरू की धरती अपने उस सैन्य नायक की विरासत को संजोए हुए है, जिसने अपने लंबे सैन्य जीवन में साहस, नेतृत्व और राष्ट्रसेवा की मिसाल कायम की।
मनीष कुमार
सहायक जनसम्पर्क अधिकारी, चूरू






