चूरू। सांसद राहुल कस्वां ने यमुना जल परियोजना समझौते (MoA) को लेकर केंद्र सरकार से सिंचाई, पेयजल और जल सुरक्षा से जुड़े प्रावधानों पर स्पष्टता की मांग की है।

प्रेस नोट के अनुसार, 2026 के मानसून सत्र में संसद में नियम 377 के तहत राहुल कस्वां ने यमुना जल परियोजना समझौते को सार्वजनिक करने और शेखावाटी के लिए पेयजल एवं सिंचाई से जुड़े प्रावधानों की जानकारी देने का मुद्दा उठाया था।

इसके बाद जल शक्ति मंत्रालय ने यमुना जल परियोजना समझौता सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कराया। प्रेस नोट के मुताबिक, जल शक्ति मंत्री सी. आर. पाटिल ने 9 सितंबर 2026 को पत्र संख्या Z-17014/30/2026-FM के माध्यम से राहुल कस्वां को समझौते से संबंधित विवरण भेजे।

MoA का समर्थन, लेकिन क्रियान्वयन पर मांगी स्पष्टता

राहुल कस्वां की ओर से जारी प्रेस नोट में कहा गया है कि MoA राजस्थान की जल सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है और वे समझौते का समर्थन करते हैं।

हालांकि, समझौते के अध्ययन के बाद परियोजना के वास्तविक लाभ और क्रियान्वयन से जुड़े कई मुद्दों पर अधिक स्पष्टता की आवश्यकता जताई गई है।

सिंचाई के लिए कितना पानी और कितनी जमीन?

प्रेस नोट में सबसे पहले सिंचाई घटक को लेकर सवाल उठाया गया है।

2026 के समझौते में वार्षिक पेयजल आवश्यकता पूरी होने के बाद उपलब्ध शेष पानी का उपयोग सिंचाई और अन्य उद्देश्यों के लिए किए जाने का प्रावधान बताया गया है। लेकिन कस्वां के अनुसार इसमें सिंचाई क्षेत्र, सिंचाई के लिए जल आवंटन और क्रियान्वयन की समय-सीमा का मात्रात्मक विवरण स्पष्ट नहीं है।

प्रेस नोट में कहा गया है कि मूल 2018-19 DPR में चूरू और झुंझुनूं के लिए 1.05 लाख हेक्टेयर CCA/वार्षिक सिंचाई क्षेत्र तथा लाभार्थी जिलों में सीकर के लिए पेयजल की परिकल्पना की गई थी।

अब सरकार से यह स्पष्ट करने की मांग की गई है कि DPR में प्रस्तावित सिंचाई घटक का वर्तमान स्वरूप क्या है, क्या यह मौजूदा परियोजना का हिस्सा है और यदि है तो कितने क्षेत्र में, कितना पानी और किस समय-सीमा में सिंचाई सुविधा मिलेगी।

राजस्थान के जल अधिकारों पर भी मांगी स्पष्टता

दूसरा बड़ा मुद्दा मानसून के बाद राजस्थान की जल सुरक्षा से जुड़ा है।

प्रेस नोट के अनुसार, परियोजना के व्यापक ढांचे में रेणुकाजी, लखवार और किशाऊ जलाशयों के निर्माण के बाद शेष अवधि में राजस्थान के संबंधित हिस्से को उसी प्रणाली के माध्यम से पेयजल और सिंचाई के लिए, जहां तक संभव हो, उपलब्ध कराने की बात है।

वहीं, 2026 के MoA में गैर-मानसून अवधि के दौरान निर्धारित शर्तों के अधीन हरियाणा को साझा पाइपलाइन के उपयोग की अनुमति का भी उल्लेख किया गया है।

कस्वां की ओर से सरकार से पूछा गया है कि राजस्थान के जल हिस्से की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित होगी, पेयजल को प्राथमिकता किस तरह मिलेगी और साझा पाइपलाइन के इस्तेमाल से राजस्थान के जल अधिकार प्रभावित न हों, इसकी व्यवस्था क्या है।

577 MCM पाइपलाइन क्षमता पर भी सवाल

प्रेस नोट में 30 जुलाई 2026 को लोकसभा में जल शक्ति मंत्रालय के जवाब का हवाला देते हुए कहा गया है कि हसियावास जलाशय की भंडारण क्षमता करीब 386 MCM है, जो पेयजल के लिए निर्धारित है।

परियोजना में करीब 192 MCM क्षमता वाली तीन भूमिगत पाइपलाइनें बताई गई हैं, जिनकी कुल क्षमता लगभग 577 MCM है।

इसके साथ ही MoA में मानसून-पश्चात अवधि में हरियाणा के साथ एक निर्धारित पाइपलाइन साझा करने का प्रावधान भी बताया गया है।

ऐसे में सरकार से यह स्पष्ट करने की मांग की गई है कि तीनों पाइपलाइनों का इस्तेमाल किस तरह होगा, क्या इनमें से एक पाइपलाइन हरियाणा के लिए निर्धारित है और इसका राजस्थान के पेयजल अधिकार पर क्या प्रभाव पड़ेगा।

चूरू, सीकर और झुंझुनूं को कितना पानी मिलेगा?

प्रेस नोट में परियोजना के जिलेवार लाभ को लेकर भी सवाल उठाया गया है।

राजस्थान को प्राथमिक लाभार्थी बताते हुए कहा गया है कि पुनर्वास एवं मुआवजे सहित परियोजना की ₹34,102.24 करोड़ की पूंजीगत लागत राजस्थान द्वारा वहन की जानी है।

इसके बावजूद समझौते में चूरू, सीकर और झुंझुनूं को मिलने वाले पानी तथा प्रत्येक जिले में पेयजल कवरेज पाने वाली अनुमानित आबादी का स्पष्ट विवरण नहीं होने की बात कही गई है।

कस्वां ने मांग की है कि जब राजस्थान इतनी बड़ी वित्तीय प्रतिबद्धता वहन कर रहा है, तो जिलेवार जल आवंटन और लाभार्थी आबादी का स्पष्ट विवरण भी सार्वजनिक किया जाना चाहिए।

किसानों की जमीन और मुआवजे पर भी सवाल

प्रेस नोट में परियोजना के लिए आवश्यक कृषि भूमि अधिग्रहण को लेकर भी चिंता जताई गई है।

समझौते में परियोजना के लिए जरूरी भूमि के अधिग्रहण और लागू कानूनों, नियमों एवं नीतियों के अनुसार मुआवजा तथा पुनर्वास का प्रावधान बताया गया है।

कस्वां की ओर से कहा गया है कि उत्पादक कृषि भूमि के अधिग्रहण को न्यूनतम रखने के लिए विशेष सुरक्षा उपाय स्पष्ट किए जाने चाहिए।

प्रेस नोट में मांग की गई है कि जहां संभव हो, स्थायी भूमि अधिग्रहण को आवश्यक परियोजना अवसंरचना तक सीमित रखा जाए और कृषि भूमि के अधिग्रहण से पहले सरकारी अथवा बंजर भूमि के विकल्पों की जांच की जाए।

साथ ही पाइपलाइन कॉरिडोर से प्रभावित गांवों में पेयजल और भूजल पुनर्भरण की व्यवस्था तथा प्रभावित किसान परिवारों की आजीविका से जुड़े मुद्दों पर ध्यान देने की मांग की गई है।

72 महीने की समय-सीमा, लेकिन पानी कब मिलेगा?

परियोजना को कार्यादेश जारी होने की तारीख से 72 महीने में पूरा किए जाने की परिकल्पना की गई है।

कस्वां की ओर से सरकार से कार्यादेश जारी होने की तारीख, प्रमुख निर्माण पड़ाव और राजस्थान को वास्तविक रूप से पानी मिलने की संभावित तारीख सार्वजनिक करने की मांग की गई है।

प्रेस नोट में कहा गया है कि चिंता केवल 577 MCM की क्षमता तक सीमित नहीं है, बल्कि वास्तविक जल आपूर्ति, जिलेवार वितरण और पेयजल जरूरत पूरी होने के बाद उपलब्ध पानी के उपयोग से भी जुड़ी है।

हसियावास और आसपास के गांवों की चिंताओं का समाधान मांगा

प्रेस नोट में हसियावास और आसपास के आठ गांवों के लोगों द्वारा परियोजना से जुड़ी भूमि, मुआवजे और आजीविका संबंधी चिंताओं का भी उल्लेख किया गया है।

कस्वां की ओर से सरकार से इन लोगों की मांगों और चिंताओं को स्पष्ट रूप से संबोधित करने तथा प्रभावित समुदायों के हितों की रक्षा सुनिश्चित करने की मांग की गई है।

प्रेस नोट में कहा गया है कि यमुना जल परियोजना समझौते का समर्थन उसके पारदर्शी क्रियान्वयन के साथ होना चाहिए, जिसमें राजस्थान के जल हितों की सुरक्षा के साथ प्रभावित समुदायों के प्रति जवाबदेही भी सुनिश्चित हो।

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