कलेक्टर से नगर परिषद और जिला परिषद तक RTI व नागरिक चार्टर की जानकारी का अभाव, NHRC की हिदायत के बावजूद हालात जस के तस
आदेश हुए, निर्देश हुए… फिर भी दीवारें खाली: झुंझुनूं में नागरिक अधिकारों पर प्रशासन बेखबर!
झुंझुनूं। सरकारी कार्यालयों में आमजन को उसके अधिकारों और सरकारी सेवाओं की जानकारी आसानी से उपलब्ध कराने के लिए नागरिक चार्टर और सूचना का अधिकार (RTI) से जुड़ी सूचनाओं का सार्वजनिक रूप से प्रदर्शन पारदर्शी प्रशासन की बुनियादी व्यवस्था मानी जाती है। लेकिन झुंझुनूं जिला मुख्यालय के ही कई प्रमुख सरकारी कार्यालयों में इन सूचनाओं का समुचित प्रदर्शन नहीं होने का मामला सामने आया है। सवाल इसलिए भी गंभीर है क्योंकि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के स्पेशल मॉनिटर बालकृष्ण गोयल के झुंझुनूं दौरे के दौरान प्रशासनिक अधिकारियों के साथ बैठक में भी सरकारी कार्यालयों में आमजन को जरूरी अधिकार संबंधी जानकारी उपलब्ध कराने पर जोर दिया गया था। जुलाई 2025 में बालकृष्ण गोयल के झुंझुनूं दौरे और प्रशासनिक अधिकारियों के साथ बैठक के दौरान इस मामले को लेकर सख्त निर्देश दिए थे लेकिन एक साल बीत जाने पर भी झुंझुनू जिला प्रशासन की चीर निंद्रा अभी तक नहीं टूटी है । राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की मीडिया मॉनिटरिंग में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार गोयल ने अधिकारियों को मानवाधिकारों से जुड़े मामलों में गंभीरता बरतने की चेतावनी दी थी और कहा था कि झुंझुनूं अब आयोग की निगरानी में रहेगा। स्थानीय रिपोर्ट में भी सरकारी कार्यालयों में RTI और सिटीजन चार्टर के प्रदर्शन का मुद्दा उठाए जाने का उल्लेख है।
जिला मुख्यालय के बड़े कार्यालयों में ही व्यवस्था अधूरी
स्थानीय स्तर पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार जिला कलेक्टर कार्यालय, उपखंड अधिकारी कार्यालय झुंझुनूं, नगर परिषद झुंझुनूं, जिला परिषद तथा सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के कार्यालय में नागरिक चार्टर और RTI से संबंधित आवश्यक जानकारी आमजन को स्पष्ट रूप से दिखाई देने वाले स्थान पर अंकित नहीं होने की बात सामने आई है। सवाल खड़ा होता है कि सरकार की आंख, नाक, कान कहे जाने वाला विभाग सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के ऊपर आम जनता तक आवश्यक जानकारी पहुंचाने की भी जिम्मेदारी होती है लेकिन इसी कार्यालय की खाली पड़ी हुई दीवारें दिशा निर्देशों की और सरकारी अधिकारियों की कार्य शैली पर सवालिया निशान खड़ा करती हैं। यह स्थिति केवल किसी सूचना-पट्ट के खाली होने का मामला नहीं है। सरकारी कार्यालय में आने वाला आम नागरिक यह जानने का हकदार है कि उसे कौन-कौन सी सेवाएं मिलनी हैं, संबंधित सेवा की समय-सीमा क्या है, आवेदन कहां करना है, संबंधित अधिकारी कौन है, शिकायत या अपील की स्थिति में किस अधिकारी से संपर्क करना है और सूचना का अधिकार इस्तेमाल करने के लिए लोक सूचना अधिकारी कौन है।
जब जिला मुख्यालय के प्रमुख कार्यालयों में ही यह जानकारी आसानी से उपलब्ध नहीं होती तो उपखंड, तहसील और ग्रामीण क्षेत्र के कार्यालयों में आमजन को कितनी पारदर्शिता और सुविधा मिल रही होगी, इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है।
नागरिक चार्टर आखिर है क्या?
नागरिक चार्टर का मूल उद्देश्य सरकारी विभाग और आम नागरिक के बीच सेवा संबंधी जवाबदेही को स्पष्ट करना है। इसमें विभाग द्वारा दी जाने वाली सेवाओं, सेवा प्राप्त करने की प्रक्रिया, निर्धारित समय-सीमा, संबंधित अधिकारी तथा शिकायत और अपील की व्यवस्था जैसी जानकारियां दी जाती हैं। जानकारों का मानना है कि राजस्थान में राजस्थान लोक सेवाओं के प्रदान की गारंटी अधिनियम, 2011 लागू है। इस कानून का उद्देश्य निर्धारित समय-सीमा में नागरिकों को अधिसूचित सरकारी सेवाएं उपलब्ध कराना है। अधिनियम में संबंधित सेवाओं के लिए पदाभिहित अधिकारी, प्रथम अपील अधिकारी और द्वितीय अपीलीय प्राधिकारी निर्धारित करने का प्रावधान है। इस कानून के तहत बनाए गए नियमों में व्यवस्था और भी स्पष्ट है। राजस्थान लोक सेवाओं के प्रदान की गारंटी नियम, 2011 के नियम 7 के अनुसार पदाभिहित अधिकारी को आम जनता की सुविधा के लिए सेवाओं से संबंधित सभी प्रासंगिक जानकारी कार्यालय के प्रमुख एवं आसानी से दिखाई देने वाले स्थान पर लगाए गए सूचना-पट्ट पर प्रदर्शित करवानी होती है। इसमें अधिसूचित सेवाओं से संबंधित जरूरी जानकारी और आवेदन के साथ लगाए जाने वाले आवश्यक दस्तावेजों की जानकारी भी शामिल है। अर्थात सरकारी सेवा के संबंध में जानकारी केवल फाइलों या अधिकारी के कमरे तक सीमित रखने के बजाय उसे आम नागरिक की पहुंच में रखना व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
RTI में भी स्वप्रेरित सूचना देने की जिम्मेदारी
जानकारों के अनुसार सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 4 सरकारी संस्थाओं की पारदर्शिता और स्वप्रेरित सूचना प्रकटीकरण से जुड़ी महत्वपूर्ण व्यवस्था है। धारा 4(1)(b) के तहत लोक प्राधिकरण को संगठन, कार्य एवं कर्तव्य, अधिकारियों की शक्तियां और जिम्मेदारियां, निर्णय लेने की प्रक्रिया, लागू नियम, दस्तावेजों की श्रेणियां, अधिकारियों-कर्मचारियों की निर्देशिका, बजट, योजनाएं और नागरिकों के लिए उपलब्ध सुविधाओं सहित कई प्रकार की सूचनाएं प्रकाशित करनी होती हैं। इनमें लोक सूचना अधिकारियों के नाम, पदनाम और अन्य विवरण भी शामिल हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि धारा 4(3) और 4(4) के अनुसार ऐसी सूचनाओं का व्यापक प्रसार होना चाहिए और उन्हें ऐसी पद्धति से उपलब्ध कराया जाना चाहिए जिससे जनता को आसानी से जानकारी मिल सके। कानून में सूचना के प्रसार के माध्यमों में नोटिस बोर्ड, समाचार पत्र, सार्वजनिक घोषणाएं, मीडिया, इंटरनेट तथा संबंधित कार्यालय का निरीक्षण तक शामिल किया गया है।इसलिए RTI के मामले में केवल वेबसाइट पर जानकारी डाल देना ही पारदर्शिता का अंतिम आधार नहीं माना जा सकता। कार्यालय स्तर पर भी नागरिकों के लिए आवश्यक जानकारी को सहज और सुलभ तरीके से उपलब्ध कराना धारा 4 की भावना के अनुरूप है।
कौन-कौन सी RTI जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए?
किसी सरकारी कार्यालय में RTI से संबंधित सूचना को नागरिकों के लिए स्पष्ट रूप से उपलब्ध कराते समय कम से कम यह जानकारी प्रमुखता से दिखाई जानी चाहिए कि –
संबंधित कार्यालय का लोक सूचना अधिकारी कौन है।
सहायक लोक सूचना अधिकारी, जहां लागू हो, कौन है।
प्रथम अपीलीय प्राधिकारी कौन है।
RTI आवेदन किस अधिकारी के पास और किस पते पर दिया जा सकता है।
आवेदन और अपील की प्रक्रिया क्या है।
धारा 4(1)(b) के तहत कार्यालय द्वारा स्वप्रेरित रूप से प्रकाशित की जाने वाली सूचनाएं कहां उपलब्ध हैं।
नागरिक सूचना प्राप्त करने के लिए किन सुविधाओं और माध्यमों का उपयोग कर सकते हैं।
राजस्थान सरकार के विभिन्न विभाग अपने RTI पेजों पर लोक सूचना अधिकारी और प्रथम अपीलीय प्राधिकारी के विवरण प्रकाशित कर रहे हैं। उदाहरण के तौर पर विधि एवं विधिक कार्य विभाग की वेबसाइट पर RTI अधिनियम, नियम और लोक सूचना अधिकारियों की सूची उपलब्ध है, जबकि अन्य विभाग धारा 4(1)(b) के तहत अनिवार्य प्रकटीकरण भी प्रकाशित कर रहे हैं।
पारदर्शिता का दावा, लेकिन सूचना पट्ट गायब
सरकारी कार्यालयों में नागरिक चार्टर और RTI संबंधी जानकारी प्रदर्शित करने का मकसद महज औपचारिकता पूरी करना नहीं है। इसका सीधा संबंध प्रशासन की जवाबदेही से है। जब किसी नागरिक को सरकारी सेवा के लिए कार्यालय में जाना पड़े तो उसे यह पता होना चाहिए कि उसका काम कौन करेगा और कितने समय में करेगा। इसी तरह RTI के माध्यम से सूचना मांगने वाले नागरिक को यह पता होना चाहिए कि आवेदन किस अधिकारी के पास देना है और अपील की स्थिति में अगला अधिकारी कौन है। यदि यह जानकारी कार्यालय की दीवार या सूचना-पट्ट पर स्पष्ट रूप से उपलब्ध नहीं है तो आम नागरिक को अनावश्यक रूप से कर्मचारियों और अधिकारियों से जानकारी जुटानी पड़ती है। इससे पारदर्शिता और नागरिक सुविधा दोनों प्रभावित होती हैं।
मानवाधिकारों से भी जुड़ा है सूचना तक आसान पहुंच का सवाल
सूचना तक आसान पहुंच केवल प्रशासनिक सुविधा का विषय नहीं है। सरकारी योजनाओं, सेवाओं, शिकायत निवारण, अधिकारियों की जिम्मेदारी और अधिकारों की जानकारी नागरिक को अपने अधिकारों का प्रभावी इस्तेमाल करने में सक्षम बनाती है। यही वजह है कि पारदर्शिता और जवाबदेही को मानवाधिकारों की प्रभावी सुरक्षा से भी जोड़ा जाता है। झुंझुनूं दौरे के दौरान NHRC के स्पेशल मॉनिटर बालकृष्ण गोयल ने प्रशासनिक अधिकारियों के साथ बैठक में मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों में लापरवाही नहीं बरतने की चेतावनी दी थी। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने यह भी कहा था कि जिले में भविष्य में मानवाधिकार उल्लंघन की शिकायत आने पर अधिकारियों की जवाबदेही तय की जा सकती है। ऐसे में यदि उनके दौरे के बाद भी सरकारी कार्यालयों में नागरिकों को उनके अधिकारों और सरकारी सेवाओं की बुनियादी जानकारी देने वाली व्यवस्थाएं प्रभावी रूप से लागू नहीं हुई हैं, तो यह प्रशासनिक स्तर पर समीक्षा का विषय बनता है।
सवाल अब जिला प्रशासन से
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब राजस्थान में लोक सेवाओं की समयबद्ध डिलीवरी के लिए कानून और नियम मौजूद हैं तथा RTI अधिनियम की धारा 4 सरकारी संस्थाओं पर स्वप्रेरित सूचना प्रकटीकरण की जिम्मेदारी डालती है, तो जिला मुख्यालय के प्रमुख कार्यालयों में इन प्रावधानों की जमीनी स्थिति क्या है?
क्या जिला प्रशासन ने सभी कार्यालयों का निरीक्षण कर यह सत्यापित किया है कि वहां नागरिक चार्टर, अधिसूचित सेवाओं, सेवा की समय-सीमा, पदाभिहित अधिकारियों, लोक सूचना अधिकारियों और प्रथम अपीलीय अधिकारियों की जानकारी आमजन को आसानी से दिखाई दे रही है?
क्या मानवाधिकार आयोग के स्पेशल मॉनिटर के दौरे के बाद इस संबंध में कोई अनुपालन रिपोर्ट तैयार हुई? यदि हुई तो किन-किन कार्यालयों ने इसका पालन किया और किन कार्यालयों को अब तक निर्देश जारी किए गए?
इन सवालों के जवाब जरूरी हैं, क्योंकि जवाबदेह प्रशासन केवल आदेश जारी करने से नहीं, बल्कि उन आदेशों और कानूनों को आम नागरिक की आंखों के सामने लागू करने से दिखाई देता है।
अब कार्रवाई की जरूरत
जिला प्रशासन को चाहिए कि वह जिला मुख्यालय से लेकर उपखंड, तहसील और ग्रामीण स्तर तक सभी सरकारी कार्यालयों का भौतिक सत्यापन करवाए। प्रत्येक कार्यालय में प्रमुख स्थान पर नागरिक चार्टर, अधिसूचित सेवाओं और समय-सीमा से संबंधित सूचना-पट्ट तथा RTI के तहत लोक सूचना अधिकारी और प्रथम अपीलीय प्राधिकारी की जानकारी स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करवाई जाए। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि प्रदर्शित जानकारी पुरानी न हो और अधिकारियों के स्थानांतरण के बाद उसे तत्काल अपडेट किया जाए। विभागीय वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी और कार्यालय के सूचना-पट्ट पर प्रदर्शित जानकारी में भी समानता हो।
आमजन को अपने अधिकारों की जानकारी देना प्रशासन की मेहरबानी नहीं, बल्कि पारदर्शी और जवाबदेह शासन की बुनियादी शर्त है। झुंझुनूं में अब देखना यह होगा कि इस मामले में जिला प्रशासन केवल कागजी कार्रवाई करता है या वास्तव में प्रत्येक सरकारी कार्यालय की दीवार पर नागरिक के अधिकारों की जानकारी दिखाई देती है।
“नोटिस बोर्ड हैं, जानकारी नहीं”

कलेक्टर कार्यालय जिले के प्रशासन का सबसे बड़ा केंद्र होता है, जहां से शासन की नीतियां और आमजन से जुड़ी व्यवस्थाएं संचालित होती हैं। ऐसे में इसी कार्यालय के बाहर नागरिकों के अधिकारों और प्रशासन की जवाबदेही से जुड़ी जानकारी स्पष्ट रूप से प्रदर्शित होना सबसे जरूरी है। लेकिन झुंझुनूं कलेक्टर कार्यालय की पड़ताल में तस्वीर कुछ अलग नजर आई। कार्यालय के बाहर नोटिस बोर्ड तो लगे मिले, लेकिन कई बोर्ड खाली नजर आए। इनमें न तो सिटीजन चार्टर की जानकारी थी और न ही सूचना के अधिकार (RTI) से संबंधित जरूरी विवरण।
हालांकि पूरी तस्वीर एकतरफा नहीं थी। कुछ प्रकोष्ठों को छोड़कर विभिन्न शाखाओं और विभागों के बाहर वहां होने वाले कार्यों से संबंधित जानकारी प्रदर्शित मिली। यानी विभागीय कामकाज की कुछ सूचनाएं जनता के लिए उपलब्ध थीं, लेकिन नागरिकों को उनके अधिकार, RTI के तहत सूचना मांगने की प्रक्रिया बताने वाली अहम जानकारी का अभाव साफ दिखाई दिया।
विडंबना यह है कि जिस कार्यालय से पूरे जिले के प्रशासन को पारदर्शिता और जवाबदेही का संदेश जाना चाहिए, उसी के बाहर जनता को अपने अधिकारों की जानकारी देने वाला सूचना-पट्ट ही अधूरा नजर आ रहा है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब जिला प्रशासन के मुख्यालय में ही नागरिक चार्टर और RTI की जानकारी प्रमुखता से प्रदर्शित नहीं है, तो अधीनस्थ कार्यालयों में आमजन की सूचना और अधिकारों तक पहुंच की स्थिति क्या होगी?
जिस दीवार पर अधिकार लिखे होने चाहिए, वहां सन्नाटा! झुंझुनूं के सरकारी दफ्तरों में RTI-सिटीजन चार्टर गायब

स्थानीय लोगों ने बताया कि झुंझुनू नगर परिषद की इस दीवार पर कभी लगी होती थी सूचना के अधिकार से संबंधित जानकारी अब नदारद, हालांकि दूसरी दीवार पर ऑनलाइन होने वाले कामों की लगाई गई है लिस्ट

झुंझुनू जिला परिषद में सिटिजन चार्टर और सूचना का अधिकार की जानकारी गायब, हालांकि कोरोना काल का लगाया गया नोटिस “बिना मास्क प्रवेश वर्जित है” आज भी लगा हुआ है

उपखंड अधिकारी कार्यालय झुंझुनू सिटिजन चार्टर और सूचना का अधिकार गायब, हालांकि उपखंड अधिकारी के दफ्तर के सामने दीवार पर अंकित है इस कार्यालय में शिकायतों और परिवादो की रसीद दी जाती है और शपथ पत्र बंद करने की व्यवस्था से संबंधित जानकारी

सूचना एवं जनसंपर्क विभाग झुंझुनू के कार्यालय के बाहर खाली पड़ी दीवारें बयान कर रही है सरकार के आंख नाक कान विभाग की दास्तान, हालांकि पुरानी बंद बिल्डिंग के बाहर सूचना अंकित है कि इस कार्यालय में रसीद देने की व्यवस्था है।







