नई दिल्ली। कुत्ते के काटने के बाद अस्पताल में एंटी-रेबीज टीका लगवा देना ही रेबीज से बचाव की पूरी जिम्मेदारी नहीं होगी। केंद्र सरकार ने शहरों को रेबीज मुक्त बनाने के लिए नई व्यवस्था लागू की है। इसके तहत किसी शहर को रेबीज फ्री तभी घोषित किया जाएगा, जब वहां लगातार तीन वर्ष तक कुत्ते से फैलने वाले रेबीज से एक भी मौत न हो और हर साल शहर के कम से कम 70 प्रतिशत कुत्तों का टीकाकरण किया जाए।

डॉग बाइट और रेबीज पर अब एक साथ होगी कार्रवाई

अब तक डॉग बाइट और रेबीज नियंत्रण की जिम्मेदारी अलग-अलग विभागों में बंटी हुई थी। इससे कई बार जवाबदेही तय करना मुश्किल होता था। राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (एनसीडीसी) की नई मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) में डॉग बाइट और रेबीज को ‘वन हेल्थ’ व्यवस्था के तहत रखा गया है।

इसका मतलब है कि इंसानों और जानवरों की सेहत को ध्यान में रखते हुए सभी संबंधित विभाग मिलकर काम करेंगे।

हर शहर में बनेगी टास्क फोर्स

नई व्यवस्था के तहत प्रत्येक शहर में एक विशेष टास्क फोर्स बनाई जाएगी। इसमें नगर निकाय, स्वास्थ्य विभाग, पशुपालन विभाग और वन विभाग के अधिकारी शामिल होंगे।

टास्क फोर्स की जिम्मेदारी रेबीज नियंत्रण की योजना बनाने, अभियान की निगरानी करने और उसकी रिपोर्ट तैयार करने की होगी।

संदिग्ध मौत पर 48 घंटे में जांच शुरू

यदि किसी व्यक्ति में संदिग्ध रेबीज का मामला सामने आता है या रेबीज से मौत होती है तो स्वास्थ्य, पशुपालन और नगर निकाय की संयुक्त टीम जांच करेगी।

स्वास्थ्य सुविधा को संदिग्ध मौत की सूचना 24 घंटे के भीतर संबंधित स्वास्थ्य केंद्र को देनी होगी। इसके बाद स्थानीय टीम को 48 घंटे के भीतर जांच शुरू करनी होगी।

जांच में यह पता लगाया जाएगा कि मरीज को कुत्ते या अन्य जानवर ने कब और कहां काटा, इलाज कब मिला और संबंधित पशु की स्थिति क्या थी। जरूरत पड़ने पर पशु के नमूने की जांच भी कराई जाएगी।

यदि मामला जंगली जानवर से जुड़ा है तो वन विभाग को भी जांच में शामिल किया जाएगा।

अस्पतालों में वैक्सीन और सीरम की उपलब्धता पर निगरानी

नई व्यवस्था में अस्पतालों में एंटी-रेबीज वैक्सीन और सीरम की उपलब्धता तथा मरीजों को समय पर उपचार मिलने की भी निगरानी की जाएगी। इसका उद्देश्य डॉग बाइट के बाद पीड़ित को समय पर जरूरी उपचार उपलब्ध कराना है।

पहले चिन्हित होंगे डॉग बाइट के हॉटस्पॉट

पूरे शहर में एक समान अभियान चलाने के बजाय पहले उन क्षेत्रों की पहचान की जाएगी जहां डॉग बाइट का जोखिम अधिक है।

इसके लिए पिछले तीन वर्षों के कुत्ते और अन्य जानवरों के काटने के आंकड़ों का विश्लेषण किया जाएगा। इसके आधार पर इलाकों को अधिक, मध्यम और कम जोखिम वाली श्रेणियों में बांटा जाएगा।

अधिक जोखिम वाले क्षेत्रों में कुत्तों के टीकाकरण और अन्य नियंत्रण उपायों को प्राथमिकता दी जाएगी।

हर वार्ड में कुत्तों की संख्या और टीकाकरण का रिकॉर्ड

नगर निकायों को प्रत्येक वार्ड में कुत्तों की संख्या और डॉग बाइट के जोखिम वाले क्षेत्रों का रिकॉर्ड तैयार करना होगा। इसके साथ ही यह भी दर्ज किया जाएगा कि कितने कुत्तों का टीकाकरण हुआ है।

इससे केवल टीकाकरण के आंकड़े बताने के बजाय कुल कुत्तों की संख्या के मुकाबले वास्तविक टीकाकरण कवरेज का आकलन किया जा सकेगा।

70 प्रतिशत टीकाकरण जरूरी

रेबीज फ्री सिटी के लिए सिर्फ यह बताना पर्याप्त नहीं होगा कि कितने कुत्तों को वैक्सीन लगाई गई। यह भी देखा जाएगा कि शहर में मौजूद कुल कुत्तों में से कितने प्रतिशत वास्तव में टीकाकरण के दायरे में आए।

हर साल कम से कम 70 प्रतिशत कुत्तों का टीकाकरण करना जरूरी होगा। इसके लिए नगर निकाय और पशुपालन विभाग पहले से टीमों, वाहनों, कुत्ता पकड़ने वाले कर्मचारियों और वैक्सीन की आवश्यकता का आकलन करेंगे।

नसबंदी के बाद उसी क्षेत्र में छोड़े जाएंगे कुत्ते

कुत्तों की नसबंदी भी रेबीज नियंत्रण अभियान का हिस्सा होगी। नसबंदी के बाद कुत्तों को उसी क्षेत्र में वापस छोड़ने की व्यवस्था करनी होगी, जहां से उन्हें पकड़ा गया था।

खुले कूड़े पर भी होगी कार्रवाई

रेबीज नियंत्रण में कूड़ा प्रबंधन को भी अहम माना गया है। खुले में पड़ा खाद्य कचरा आवारा कुत्तों को आकर्षित करता है, जिससे इंसानों और कुत्तों के बीच टकराव बढ़ सकता है।

इसलिए नगर निकायों को कूड़े का समय पर निस्तारण सुनिश्चित करना होगा। मांस की दुकानों के आसपास भी कचरा खुले में नहीं पड़ा रहे, इसकी निगरानी की जाएगी।

इसके अलावा पालतू कुत्तों का पंजीकरण भी स्थानीय निकायों की जिम्मेदारी होगी।

रेबीज फ्री सिटी का दावा अब आंकड़ों से परखा जाएगा

नई व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि किसी शहर को केवल टीकाकरण अभियान चलाने के आधार पर रेबीज मुक्त नहीं माना जाएगा। इसके लिए लगातार तीन साल तक कुत्ते से होने वाले रेबीज से शून्य मौत और हर साल कम से कम 70 प्रतिशत कुत्तों का टीकाकरण जैसे मानकों को पूरा करना होगा।

इस पूरी प्रक्रिया में मानव स्वास्थ्य, पशु स्वास्थ्य, टीकाकरण, नसबंदी, कूड़ा प्रबंधन और डॉग बाइट के आंकड़ों को एक साथ जोड़कर रेबीज नियंत्रण की वास्तविक स्थिति का आकलन किया जाएगा।

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