सरकार जमीन के प्रत्येक भूखंड को डिजिटल पहचान देने की दिशा में नई व्यवस्था लागू कर रही है।

इसके तहत गांव से लेकर शहर तक के भूखंडों को 14 अंकों के यूनिवर्सल लैंड पार्सल आइडेंटिफिकेशन नंबर (ULPIN) से जोड़ा जाएगा। इसे आम तौर पर भू-आधार के रूप में जाना जा रहा है।

सरकार ने डिजिटल इंडिया लैंड रिकॉर्ड्स मॉडर्नाइजेशन प्रोग्राम के तहत इस व्यवस्था के लिए 565.50 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है।

एक जगह मिल सकेगी जमीन की पूरी जानकारी

अभी जमीन से जुड़ी अलग-अलग जानकारियां अलग रिकॉर्ड में दर्ज होती हैं। खाता, खसरा या प्लॉट नंबर राजस्व रिकॉर्ड में मिलते हैं, जबकि जमीन का नक्शा अलग रिकॉर्ड में हो सकता है।

इसी तरह जमीन की खरीद-बिक्री और रजिस्ट्री की जानकारी रजिस्ट्रेशन कार्यालय में होती है। अगर जमीन पर बैंक का कर्ज है या उससे जुड़ा कोई विवाद चल रहा है तो उसकी जानकारी दूसरे रिकॉर्ड में मिलती है।

नई डिजिटल व्यवस्था में इन जानकारियों को आपस में जोड़ने की कोशिश की जा रही है। इससे किसी भूखंड की स्थिति की जांच करना पहले की तुलना में आसान हो सकता है।

डिजिटल नक्शे से जमीन की वास्तविक स्थिति पता चलेगी

भूमि संसाधन विभाग के अनुसार कागजों पर मौजूद जमीन के नक्शों को उनकी वास्तविक भौगोलिक पहचान से जोड़ा जा रहा है।

किसी भूखंड का भू-आधार नंबर मिलने पर उसके डिजिटल नक्शे, अधिकार रिकॉर्ड और पंजीकरण संबंधी जानकारी को एक साथ देखा जा सकेगा।

इससे यह जांचना आसान होगा कि दस्तावेजों में दर्ज प्लॉट वास्तव में कहां स्थित है और उसकी सीमा क्या है।

जमीन खरीदने वालों को भी होगा फायदा

नई व्यवस्था का बड़ा फायदा जमीन खरीदने वालों को मिल सकता है। खरीदार दस्तावेजों में दर्ज जमीन के विवरण का डिजिटल नक्शे से मिलान कर सकेगा।

इससे गलत जमीन दिखाने, जमीन की पहचान को लेकर भ्रम और सीमा विवाद जैसी समस्याओं को कम करने में मदद मिल सकती है।

जमीन खरीदने से पहले उसके पुराने लेन-देन और उससे जुड़ी जरूरी जानकारी की जांच भी आसान बनाने का लक्ष्य है।

किसानों के लिए संस्थागत ऋण लेना हो सकता है आसान

सरकार के अनुसार अलग-अलग रिकॉर्ड को डिजिटल रूप से जोड़ने से किसानों को संस्थागत ऋण लेने में भी सुविधा हो सकती है।

जमीन से जुड़े दस्तावेजों और रिकॉर्ड की जानकारी डिजिटल रूप से उपलब्ध होने पर लोगों को विभिन्न कार्यालयों में बार-बार जाने की जरूरत कम हो सकती है।

कर्ज और विवाद की जानकारी भी जोड़ी जाएगी

जमीन से जुड़े राजस्व और अदालती मामलों को भी भू-आधार से जोड़ने की तैयारी की जा रही है।

इससे जमीन से जुड़े मामलों के रिकॉर्ड को डिजिटल तरीके से व्यवस्थित करने और राजस्व अदालतों को पेपरलेस बनाने में मदद मिल सकती है।

पुराने रजिस्ट्रेशन रिकॉर्ड को स्कैन करके डिजिटल रूप में सुरक्षित रखने की भी व्यवस्था की जा रही है। इससे पुश्तैनी जमीन के पुराने दस्तावेजों के खोने या खराब होने का खतरा कम किया जा सकेगा।

भू-आधार मालिकाना हक का प्रमाण नहीं होगा

सरकार ने इस व्यवस्था को लेकर एक महत्वपूर्ण बात स्पष्ट की है। भू-आधार को जमीन के मालिकाना हक का प्रमाण पत्र नहीं माना जाएगा।

जमीन का स्वामित्व संबंधित राज्य के वैध भूमि रिकॉर्ड और वहां लागू कानूनों के आधार पर ही तय होगा।

यानी भू-आधार मुख्य रूप से भूखंड की डिजिटल पहचान और उससे जुड़े रिकॉर्ड को आपस में जोड़ने की व्यवस्था होगी, इसे स्वामित्व प्रमाण के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाएगा।

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