गुजरात की सूरत साइबर क्राइम सेल ने उत्तर प्रदेश के कानपुर से 18 वर्षीय युवक को गिरफ्तार किया है। पुलिस के अनुसार आरोपी देशभर में सक्रिय साइबर अपराधियों के लिए फर्जी बैंकिंग एप्लिकेशन और मालवेयर युक्त APK फाइलें तैयार कर उन्हें उपलब्ध कराता था। जांच में सामने आया कि आरोपी ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और टेलीग्राम का उपयोग कर ऐसे टूल विकसित किए, जिनका इस्तेमाल साइबर ठगी में किया जाता था।
11वीं तक पढ़ाई, 16 साल की उम्र से शुरू किया काम
पुलिस के मुताबिक गिरफ्तार आरोपी की पहचान रोहित वीरेंद्र सिंह शाक्य निवासी कानपुर के रूप में हुई है। जांचकर्ताओं का दावा है कि उसने केवल 11वीं कक्षा तक पढ़ाई की थी, लेकिन 16 वर्ष की उम्र से ही AI टूल्स और टेलीग्राम की मदद से खतरनाक APK फाइलें बनाना शुरू कर दिया था।
पुलिस का कहना है कि इन एप्लिकेशनों का उपयोग मोबाइल फोन हैक करने और संवेदनशील डेटा चोरी करने में किया जाता था।
जामताड़ा समेत कई राज्यों के गैंग से जुड़े तार
जांच के दौरान पुलिस को जानकारी मिली कि झारखंड के जामताड़ा में सक्रिय कई साइबर गिरोहों के अलावा हरियाणा और राजस्थान के कुछ साइबर अपराधी समूह भी आरोपी से मालवेयर एप्लिकेशन हासिल कर रहे थे।
पुलिस इस पूरे नेटवर्क की भी जांच कर रही है।
ऐसे खुला पूरा नेटवर्क
पुलिस के अनुसार मामला मई 2026 में सूरत में दर्ज एक साइबर ठगी से जुड़ा है। एक पीड़ित को WhatsApp पर PNB One बैंकिंग ऐप जैसा दिखने वाला APK भेजा गया। असली ऐप समझकर उसे इंस्टॉल करने के कुछ ही देर बाद मोबाइल फोन हैक हो गया और प्राइम को-ऑपरेटिव बैंक में मौजूद पीड़ित के खाते से 5 लाख रुपये यूनियन बैंक के एक खाते में ट्रांसफर कर दिए गए।
शिकायत मिलने के बाद सूरत साइबर क्राइम सेल ने तकनीकी जांच शुरू की और आरोपी तक पहुंच गई। पुलिस और आईटी विशेषज्ञों की टीम ने कानपुर के एक होटल में छापा मारकर उसे गिरफ्तार कर लिया।
दो तरह के ऐप बनाता था आरोपी
पुलिस ने आरोपी के कब्जे से लैपटॉप, मोबाइल फोन और अन्य डिजिटल उपकरण जब्त किए हैं।
जांच के अनुसार आरोपी दो प्रकार के एप्लिकेशन तैयार करता था
- पहला ऐप पीड़ित के मोबाइल में इंस्टॉल कराया जाता था।
- दूसरा एडमिन एप्लिकेशन होता था, जिसके जरिए साइबर अपराधी पीड़ित के मोबाइल से OTP, बैंकिंग डिटेल्स और अन्य संवेदनशील जानकारी रियल टाइम में देख सकते थे।
सब्सक्रिप्शन मॉडल पर बेचता था सॉफ्टवेयर
पुलिस जांच में यह भी सामने आया कि आरोपी कथित तौर पर सब्सक्रिप्शन आधारित मॉडल पर काम करता था। जांचकर्ताओं के अनुसार वह सॉफ्टवेयर की शुरुआती इंस्टॉलेशन के लिए 15 हजार रुपये और बाद की सेवा के लिए हर महीने 15 हजार रुपये वसूलता था।
पुलिस मामले में आरोपी से पूछताछ कर रही है और नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों की भूमिका की भी जांच की जा रही है।






