Archive Notice: This article was originally published on 8 जनवरी 2026.
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जानकारी के लिए बता दे कि भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार और ईपीएफओ को चार महीने के भीतर इस मुद्दे पर निर्णय लेने को कहा है। टीओआई से बात करते हुए, अधिकारियों ने कहा कि वेतन को स्पष्ट रूप से परिभाषित करने से, श्रम संहिता पात्रता पर विवादों को कम करेगी। उन्होंने यह भी कहा कि वर्तमान सीमा में, अधिकांश योगदान लगभग 15,000 रुपये है और वृद्धि इस स्तर को बढ़ा देगी, जिससे कर्मचारियों को सेवानिवृत्त होने पर अधिक पैसा मिल सकेगा।

कई श्रमिक संघ लंबे समय से मांग कर रहे हैं कि सरकार ईपीएफओ की वेतन सीमा को मौजूदा 15,000 रुपये से बढ़ाए, जिसे मोदी सरकार ने 11 साल पहले 2014 में संशोधित किया था। अब, इससे मजदूरी सीमा में बदलाव की उम्मीदें और मजबूत हुई हैं। संसद के शीतकालीन सत्र में, श्रम और रोजगार मंत्री मनसुख मंडाविया ने स्पष्ट किया कि ईपीएफओ में पंजीकृत प्रतिष्ठानों में 15,000 रुपये तक की आय वाले कर्मचारियों को अनिवार्य रूप से कवर किया जाता है।

उन्होंने यह भी कहा कि वेतन सीमा में कोई भी बदलाव कर्मचारी संघों और उद्योग प्रतिनिधियों से परामर्श करने के बाद ही किया जाता है क्योंकि इसका प्रभाव कर्मचारियों के घर ले जाने वाले वेतन और मालिकों की लागत दोनों पर पड़ता है। सरकार ने यह भी स्वीकार किया है कि निजी क्षेत्र के कई कर्मचारी जो 15,000 रुपये से थोड़ा अधिक कमाते हैं, वे किसी भी पेंशन योजना के तहत शामिल नहीं हैं, जिससे भविष्य में उनकी आर्थिक निर्भरता का खतरा बढ़ सकता है।

आज की शहरी वेतन संरचना को देखते हुए, 18,000-25,000 रुपये कमाने वाले कई प्रवेश स्तर के कर्मचारी ईपीएफ के दायरे से बाहर हैं। मौजूदा नियमों के तहत, 15,000 रुपये से अधिक कमाने वाले कर्मचारी ईपीएफ से बाहर निकल सकते हैं, और नियोक्ता कानूनी रूप से उन्हें शामिल करने के लिए बाध्य नहीं हैं। कर्मचारी संगठनों का तर्क है कि यह सीमा अब पुरानी हो गई है और इसे कम से कम ₹30,000 तक बढ़ाया जाना चाहिए।

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