जोधपुर। पश्चिमी राजस्थान के गर्म और शुष्क इलाकों में किसानों के लिए मोठ बीन की खेती हमेशा चुनौतीपूर्ण रही है। यहां महज 150 से 250 एमएम की अनिश्चित बारिश, लंबे सूखे दौर और मिट्टी में नमी की कमी के बीच फसल उत्पादन करना पड़ता है।

ऐसे कठिन हालात में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद-केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (काजरी), जोधपुर की ओर से विकसित मोठ की चार नई किस्मों ने खरीफ 2026 में अपनी प्रतिकूलता-सहनशीलता का शानदार प्रदर्शन किया है।

काजरी की मोठ-4, मोठ-5, मोठ-6 और मोठ-7 किस्मों ने करीब 35 दिनों तक बारिश की कमी के बावजूद खेत में अपनी बढ़वार और फलियों के विकास को बनाए रखा।

3 अगस्त के बाद थमा मानसून, 35 दिन रहा सूखा

10 जुलाई से 2 सितंबर 2026 के फसल चक्र के दौरान कुल वाष्पीकरण करीब 317 एमएम दर्ज किया गया। 3 अगस्त को अच्छी बारिश होने के बाद मानसून अचानक कमजोर पड़ गया और फसल के महत्वपूर्ण विकास चरण में लंबा सूखा शुरू हो गया।

3 अगस्त से 7 सितंबर तक 35 दिनों के दौरान ही करीब 180 एमएम वाष्पीकरण हो गया। इस दौरान फसल को शुरुआती चरण के बाद बहुत कम पानी मिला।

2 अगस्त को हुई करीब 86 एमएम बारिश तक 0 से 10 सेंटीमीटर की ऊपरी मिट्टी में नमी 15-16 प्रतिशत थी। बाद में एक महीने से अधिक समय तक बारिश नहीं होने और मामूली बूंदाबांदी के कारण यह नमी घटकर 5-6 प्रतिशत रह गई।

हालांकि, 10 से 40 सेंटीमीटर की निचली मिट्टी की परत में नमी 23 प्रतिशत से घटकर 16 प्रतिशत तक ही आई। इस नमी ने फसल की पानी की जरूरत पूरी करने और लंबे सूखे से मुकाबला करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

सही फसल प्रबंधन ने भी निभाई अहम भूमिका

काजरी की किस्मों के बेहतर प्रदर्शन के पीछे केवल आनुवंशिक क्षमता ही नहीं, बल्कि सही फसल प्रबंधन तकनीक का भी योगदान रहा।

मानसून आने के साथ समय पर बुवाई, 45×10 सेंटीमीटर पौध दूरी, बुवाई के करीब 20 दिन बाद यांत्रिक गुड़ाई और मशीन व हाथ से निराई-गुड़ाई जैसी तकनीकों को अपनाया गया।

इन उपायों से खेत में उपलब्ध नमी को संरक्षित करने और खरपतवार से फसल की प्रतिस्पर्धा कम करने में मदद मिली।

प्रयोगात्मक खेतों की उर्वरता भी अपेक्षाकृत कम थी। मिट्टी में जैविक कार्बन महज 0.13-0.18 प्रतिशत, pH 7.9-8.1, उपलब्ध नाइट्रोजन 90-100 किग्रा/हेक्टेयर और फास्फोरस 10-15 किग्रा/हेक्टेयर था।

30 दिन में फलने-फूलने की क्षमता

इन किस्मों की प्रमुख विशेषताओं में डेवलपमेंटल प्लास्टिसिटी शामिल है। काजरी के अनुसार ये किस्में बुवाई के करीब 30 दिनों के भीतर फलने-फूलने की प्रक्रिया शुरू कर सकती हैं और मिट्टी में उपलब्ध नमी के अनुसार अपनी बढ़वार और पकने के समय को समायोजित कर सकती हैं।

पश्चिमी राजस्थान जैसे क्षेत्र में यह क्षमता बेहद महत्वपूर्ण है, जहां बारिश की मात्रा और समय में काफी उतार-चढ़ाव रहता है।

खास बात यह रही कि बारिश की लंबी कमी उस समय आई जब फसल में फूल आ रहे थे, फलियां बन रही थीं और दाने विकसित हो रहे थे। इसके बावजूद बुवाई के करीब 55 दिन बाद खेतों में हरियाली, अच्छा फैलाव और फलियों से लदे पौधे दिखाई दिए।

2026 में 23.32 क्विंटल बीज की मांग

काजरी की इन चारों नई मोठ किस्मों का बीज उत्पादन बड़े पैमाने पर बढ़ाया जा रहा है। वर्ष 2026 के लिए साथी पोर्टल के माध्यम से इन किस्मों के 23.32 क्विंटल बीज की मांग दर्ज हुई है।

इस मांग को पूरा करने के लिए काजरी रिसर्च फार्म की सात हेक्टेयर भूमि पर बीज उत्पादन किया जा रहा है। वर्ष 2025 में इन चारों किस्मों के लिए साथी पोर्टल के जरिए कुल 63.2 क्विंटल बीज की मांग दर्ज हुई थी।

काजरी के अनुसार एक क्विंटल ब्रीडर बीज से लगभग 1,000 से 1,400 क्विंटल प्रमाणित बीज तैयार किया जा सकता है। प्रमाणित बीज का पर्याप्त विस्तार होने पर इसे बड़े क्षेत्र में बुवाई के लिए उपलब्ध कराया जा सकेगा।

वर्तमान में इन किस्मों का बीज उत्पादन राजस्थान राज्य बीज निगम (RSSC), राष्ट्रीय बीज निगम (NSC) और कुछ चयनित निजी कंपनियों द्वारा किया जा रहा है।

जलवायु अनुकूल खेती में महत्वपूर्ण कदम

कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग के सचिव एवं भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के महानिदेशक डॉ. एम. एल. जाट ने मोठ को थार मरुस्थल की अनूठी फसल बताया।

उन्होंने कहा कि काजरी की जलवायु-अनुकूल मोठ किस्में थार क्षेत्र को अधिक समृद्ध बनाने, किसानों की आय के नए अवसर पैदा करने और दालों के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हासिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

उन्होंने कहा कि लंबे समय तक बारिश नहीं होने के बावजूद वृद्धि और फलियों के विकास को बनाए रखने की क्षमता बताती है कि आनुवंशिक सुधार जलवायु-अनुकूल कृषि का महत्वपूर्ण आधार बन सकता है।

साथ ही उन्होंने समय पर बुवाई, उचित पौध संख्या, खरपतवार नियंत्रण और नमी संरक्षण जैसे सर्वोत्तम फसल प्रबंधन उपायों को इन किस्मों की क्षमता का पूरा लाभ लेने के लिए जरूरी बताया।

पश्चिमी राजस्थान के किसानों के लिए क्यों अहम हैं ये किस्में?

पश्चिमी राजस्थान में मोठ की खेती बड़े क्षेत्र में होती है, लेकिन अनिश्चित बारिश के कारण इसकी औसत उत्पादकता करीब 350 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के आसपास रहती है।

ऐसे में कम पानी में बढ़ने, सूखे दौर में अपनी वृद्धि जारी रखने और उपलब्ध नमी का बेहतर इस्तेमाल करने वाली किस्में किसानों के लिए महत्वपूर्ण विकल्प बन सकती हैं।

काजरी की नई किस्मों का खरीफ 2026 में 35 दिन की बारिश की कमी के दौरान प्रदर्शन यह संकेत देता है कि शुष्क और वर्षा आधारित खेती में जलवायु-सहिष्णु किस्मों का विस्तार आने वाले समय में किसानों के लिए बड़ा बदलाव ला सकता है।

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