सीकर, जलग्रहण विकास एवं भू-संरक्षण विभाग सीकर के अधीक्षण अभियंता रमेश कुमार मीणा ने बताया कि राजस्थान सरकार एवं भारत सरकार के सहयोग से रिफॉर्म उत्सव के माध्यम से नागरिक-केंद्रित वाटरशेड विकास सुधारों को ग्रामीण समुदायों तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है।
इस पहल का उद्देश्य जागरूकता, जनभागीदारी और सामुदायिक स्वामित्व को बढ़ावा देना है।
इसे जन योजना अभियान (PPC)-सबकी योजना, सबका विकास के साथ एकीकृत किया जा रहा है। इसकी शुरुआत 2 अक्टूबर 2026 से ग्राम सभाओं के माध्यम से होगी।
सीकर जिले में प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना 2.0 की वाटरशेड विकास परियोजनाओं के तहत 6 परियोजनाओं की 35 ग्राम पंचायतों में वाटरशेड विकास से जुड़े सुधारों एवं जानकारियों का प्रसार किया जाएगा।
इसके बाद राज्य, जिला और परियोजना स्तर पर रिफॉर्म उत्सव की विभिन्न गतिविधियां आयोजित की जाएंगी।
मिट्टी संरक्षण के साथ जल संरक्षण जरूरी
अधीक्षण अभियंता ने बताया कि मिट्टी को बचाने के लिए पानी को सहेजना जरूरी है। वाटरशेड विकास का उद्देश्य मिट्टी एवं पानी का संरक्षण कर जल सुरक्षित गांव, मजबूत खेती और समृद्ध किसान तैयार करना है।
उन्होंने बताया कि सूखा प्रभावित एवं वर्षा आधारित क्षेत्रों में जहां पहले किसान एक भी फसल नहीं उगा पाते थे, वहां अब एक फसल ली जा रही है। वहीं जहां पहले एक फसल होती थी, वहां अब दो या उससे अधिक फसलें ली जा रही हैं।
इससे कृषि उत्पादन, किसानों की आय और आजीविका के अवसर बढ़ने की बात विभाग की ओर से कही गई है।
वाटरशेड कार्यक्रम से जुड़े बताए गए परिणाम
विभाग के अनुसार, देश में पिछले 12 वर्षों में करीब 3 से 4 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र को वाटरशेड विकास कार्यक्रमों के तहत कवर किया गया है।
पूर्ण हो चुकी परियोजनाओं वाले क्षेत्रों में भूजल स्तर में 3 मीटर तक वृद्धि, खेती के क्षेत्र में 30 प्रतिशत तक बढ़ोतरी और दुग्ध उत्पादन में 40 प्रतिशत तक वृद्धि जैसे परिणाम सामने आए हैं।
इन क्षेत्रों में किसानों की वार्षिक आय में 70 प्रतिशत तक वृद्धि भी दर्ज किए जाने की जानकारी दी गई है।
प्रति हेक्टेयर राशि बढ़ाई गई
वाटरशेड विकास परियोजनाओं के तहत प्रति हेक्टेयर पहले की तुलना में अधिक राशि उपलब्ध कराई जा रही है।
विभाग के अनुसार, मैदानी क्षेत्रों में राशि 12 हजार रुपये से बढ़ाकर 22 हजार रुपये प्रति हेक्टेयर तथा पहाड़ी एवं कठिन क्षेत्रों में 15 हजार रुपये से बढ़ाकर 28 हजार रुपये प्रति हेक्टेयर की गई है।
इससे गांवों में मिट्टी एवं जल संरक्षण से जुड़े कार्य अधिक संख्या में और बेहतर तरीके से किए जाने की बात कही गई है।
परियोजना अवधि 7 साल से घटाकर 5 साल
वाटरशेड विकास परियोजनाओं की अवधि को 7 वर्ष से घटाकर 5 वर्ष किया गया है।
इससे मिट्टी एवं जल संरक्षण के कार्य जल्द पूरे होने, खेती के लिए पानी की उपलब्धता बढ़ने, मिट्टी के कटाव में कमी और भूमि की उत्पादकता में सुधार जैसे लाभ मिलने की जानकारी विभाग ने दी है।
गुणवत्तापूर्ण बीज और उन्नत कृषि उपकरण पर जोर
जल की बेहतर उपलब्धता, मृदा नमी में वृद्धि और क्षरित भूमि के पुनरुद्धार से कृषि उत्पादकता बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है।
खेत स्तर पर इन लाभों को पहुंचाने के लिए वाटरशेड परियोजना क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण बीज, उन्नत कृषि उपकरण, फसल विविधीकरण, बागवानी और कृषि वानिकी जैसी गतिविधियों को प्रोत्साहित किया जा रहा है।
इसके साथ ही स्थानीय कृषि-जलवायु परिस्थितियों के अनुरूप अन्य उत्पादन गतिविधियों को भी बढ़ावा दिया जा रहा है।
वाटरशेड विकास को जनआंदोलन बनाने का प्रयास
वाटरशेड विकास को केवल सरकारी कार्यक्रम तक सीमित न रखकर इसे जनआंदोलन बनाने पर जोर दिया जा रहा है।
समुदाय की व्यापक भागीदारी बढ़ाने के लिए विभाग की ओर से देशव्यापी वाटरशेड यात्रा एवं वाटरशेड महोत्सव का आयोजन किया गया।
इन पहलों के माध्यम से जल संरक्षण संरचनाओं के निर्माण के साथ-साथ उनके दीर्घकालिक रखरखाव में भी समुदाय की भागीदारी सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया।
रिफॉर्म उत्सव में अधिकाधिक भागीदारी का आह्वान
राज्य के जलग्रहण विकास एवं भू-संरक्षण विभाग ने जिला एवं परियोजना स्तर पर योजना को क्रियान्वित कर रहे फील्ड कार्मिकों और अधिकारियों को सक्रिय करते हुए रिफॉर्म उत्सव में अधिकाधिक जनभागीदारी सुनिश्चित करने का आह्वान किया है।
अधीक्षण अभियंता ने बताया कि विकसित भारत 2047 के लिए सूखा-मुक्त भारत के उद्देश्य से वाटरशेड सुधारों को गांव-गांव तक पहुंचाया जा रहा है।
प्रत्येक समुदाय को इस अभियान से जोड़ने और ग्रामीण लोगों तक योजनाओं के वास्तविक लाभ पहुंचाने पर जोर दिया जा रहा है।






