आलेख/ पुण्यतिथि विशेष : लेखक – धर्मपाल गाँधी

16 जुलाई 1982 को गांधीवादी समाजसेविका, स्वतंत्रता सेनानी और पूर्व राज्यसभा सदस्य बेगम अनीस किदवई का निधन हुआ था। विभाजन की हिंसा में अपने पति शफ़ी अहमद किदवई को खोने के बावजूद उन्होंने नफरत का रास्ता नहीं चुना, बल्कि महात्मा गांधी की प्रेरणा से शरणार्थियों और पीड़ित परिवारों की सेवा को अपना जीवन समर्पित कर दिया।

बेगम अनीस किदवई का जीवन भारतीय इतिहास का ऐसा अध्याय है, जो बताता है कि राष्ट्र निर्माण केवल राजनीतिक स्वतंत्रता से नहीं, बल्कि करुणा, सेवा और सामाजिक समरसता से भी होता है। आज उनकी पुण्यतिथि पर उनका योगदान एक बार फिर याद किया जा रहा है।


बचपन से मिली राष्ट्रसेवा की प्रेरणा

1906 में उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में जन्मी बेगम अनीस किदवई एक शिक्षित और राष्ट्रवादी परिवार से थीं। युवावस्था में उनका विवाह स्वतंत्रता सेनानी शफ़ी अहमद किदवई से हुआ, जिसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन और महिला कांग्रेस के माध्यम से समाज सेवा में सक्रिय भूमिका निभाई।

1921 से 1923 के बीच उन्होंने महिला कांग्रेस कमेटी की सचिव के रूप में भी कार्य किया। उनका मानना था कि स्वतंत्रता का अर्थ केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि महिलाओं का सशक्तिकरण, सामाजिक समानता और सांप्रदायिक सौहार्द भी है।


पति की हत्या के बाद गांधीजी की सलाह ने बदल दी जीवन की दिशा

1947 में देश के विभाजन के दौरान सांप्रदायिक हिंसा में उनके पति शफ़ी अहमद किदवई की हत्या कर दी गई। यह उनके जीवन का सबसे बड़ा व्यक्तिगत आघात था।

दुख की इस घड़ी में उन्होंने महात्मा गांधी से मुलाकात की। गांधीजी ने उन्हें अपने शोक में डूबने के बजाय विभाजन से प्रभावित लाखों शरणार्थियों की सेवा करने की प्रेरणा दी। यही वह क्षण था जिसने उनके जीवन की दिशा बदल दी।

इसके बाद उन्होंने दिल्ली और आसपास के शरणार्थी शिविरों में भोजन, वस्त्र, पुनर्वास और विशेष रूप से महिलाओं व बच्चों की सहायता के लिए दिन-रात काम किया। उन्होंने कभी पीड़ितों को धर्म या समुदाय के आधार पर नहीं देखा, बल्कि हर जरूरतमंद को केवल इंसान समझकर सहायता की।


राहत कार्यों से संसद तक निभाई जिम्मेदारी

स्वतंत्रता के बाद भी बेगम अनीस किदवई सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रहीं। वे दो बार राज्यसभा की सदस्य बनीं और संसद में सामाजिक न्याय, महिला कल्याण, राष्ट्रीय एकता तथा मानवीय मूल्यों से जुड़े मुद्दों को मजबूती से उठाया।

राजनीति के साथ-साथ उन्होंने साहित्य के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनकी चर्चित पुस्तक “आज़ादी की छाँव में” विभाजन की मानवीय त्रासदी का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज मानी जाती है। इसके अलावा उन्होंने “जुल्म”, “चार रुख”, “नज़रे खुश गुज़रे” और “अब जिनके देखने को” जैसी कृतियाँ भी लिखीं, जिनके लिए उन्हें साहित्यिक सम्मान प्राप्त हुए।


आज भी क्यों प्रासंगिक है बेगम अनीस किदवई का जीवन?

16 जुलाई 1982 को उनका निधन हो गया, लेकिन उनका जीवन आज भी यह संदेश देता है कि किसी भी समाज की सबसे बड़ी ताकत उसकी संवेदनशीलता और मानवीय मूल्य होते हैं।

विभाजन जैसी भीषण त्रासदी में व्यक्तिगत नुकसान सहने के बावजूद उन्होंने प्रतिशोध नहीं, बल्कि सेवा, सहिष्णुता और राष्ट्रीय एकता का मार्ग चुना। यही कारण है कि बेगम अनीस किदवई को भारतीय इतिहास की उन प्रेरणादायक महिलाओं में गिना जाता है, जिनका योगदान नई पीढ़ी तक पहुंचना चाहिए।

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