संपादकीय लेख
बदलते दौर में भारतीय समाज की संरचना जिस तेजी से बदली है, उसने हमारी कई पुरानी, मजबूत और संवेदनशील परंपराओं को झकझोर कर रख दिया है। संयुक्त परिवारों का बिखरना और एकल परिवारों का बढ़ता चलन अब केवल एक सामाजिक बदलाव नहीं, बल्कि हमारे बुजुर्गों के लिए एक मानसिक और सामाजिक त्रासदी बनता जा रहा है। हाल ही में हरियाणा के सोनीपत से सोशल मीडिया पर वायरल हुआ एक वीडियो इसका जीवंत और रूह कंपा देने वाला उदाहरण है। एक वृद्धाश्रम में रह रहे पूर्व कपड़ा व्यापारी बुजुर्ग शिवचरण रतन गुप्ता के निधन के बाद, उनकी तीन-तीन सक्षम बेटियां होने के बावजूद अंतिम संस्कार में कंधा देने कोई नहीं पहुंच सका।
आखिरकार वृद्धाश्रम के कर्मचारियों ने ही उनका अंतिम संस्कार किया और बेटियों ने मात्र कुछ पैसे ऑनलाइन ट्रांसफर कर वीडियो कॉल पर ‘लाइव स्ट्रीमिंग’ के जरिए पिता की अंतिम विदाई देखी। हद तो तब हो गई जब वीडियो कॉल पर भी औपचारिकता निभाते हुए ‘काम जल्दी खत्म करने’ और ‘पूरी वीडियो रिकॉर्डिंग भेजने’ की जल्दबाजी दिखाई गई । यह घटना चीख-चीख कर कह रही है कि आधुनिकता की अंधी दौड़ में हमारे समाज का नैतिक और पारिवारिक ढांचा किस कदर वेंटिलेटर पर आ चुका है।सोनीपत की यह त्रासद घटना यह साफ तौर पर साबित करती है कि अब इंसानी भावनाएं और कर्तव्य भी ‘डिजिटल स्क्रीन’ तक सिमट कर रह गए हैं। जिस समाज में माता-पिता बच्चों को उंगली पकड़कर चलना सिखाते हैं और उनके लिए अपना पूरा जीवन खपा देते हैं, वहां आज की युवा पीढ़ी अंतिम समय में सूचना मिलने पर भी अपनों के लिए चंद घंटे का समय नहीं निकाल पाती।
आज का बुजुर्ग समाज आर्थिक रूप से संपन्न होने के बाद भी अपनों के साथ और अपनत्व की कमी के कारण घुट-घुट कर जीने को मजबूर है। अकेलेपन का यह संकट उन्हें मानसिक रूप से खोखला कर रहा है, जिससे उनकी सामाजिक सुरक्षा पूरी तरह दांव पर लग गई है। इसके साथ ही, अकेले रह रहे या वृद्धाश्रमों के भरोसे जीने वाले वरिष्ठ नागरिक अपराधियों और ठगों के भी आसान निशाने पर आ जाते हैं, जो समाज की बढ़ती संवेदनहीनता का एक और काला चेहरा है।इस सामाजिक बिखराव के पीछे वित्तीय और संपत्ति सुरक्षा से जुड़े सरोकार भी एक बड़ा कारण बनकर उभरे हैं। कई मामलों में यह कड़वी सच्चाई देखी गई है कि बच्चे माता-पिता की संपत्ति, मकान और जीवनभर की कमाई पर तो हक जताने के लिए कानून का दरवाजा खटखटाते हैं, लेकिन जब बात उनकी जिम्मेदारी उठाने और बुढ़ापे की लाठी बनने की आती है, तो वे पैर पीछे खींच लेते हैं। इसके अलावा, डिजिटल साक्षरता की कमी के कारण आज के बुजुर्ग बैंकिंग फ्रॉड और साइबर ठगों का आसानी से शिकार बन रहे हैं।
सेवानिवृत्ति के बाद नियमित आय न होना, बढ़ती महंगाई और देश में सामाजिक सुरक्षा या पेंशन का मजबूत ढांचा न होना भी बुजुर्गों के परावलंबन को एक अभिशाप बना देता है।इसके साथ ही स्वास्थ्य सुरक्षा का मोर्चा बुजुर्गों के लिए सबसे अधिक कष्टकारी और लाचारी भरा साबित हो रहा है। उम्र बढ़ने के साथ ही अल्जाइमर, डिमेंशिया, हृदय रोग या अन्य गंभीर शारीरिक व्याधियों के दौरान निरंतर चिकित्सा की आवश्यकता होती है। आज के दौर में भारत में स्वास्थ्य सेवाएं लगातार महंगी हो रही हैं, और स्वास्थ्य बीमा की प्रीमियम दरें इतनी अधिक हैं कि आम वरिष्ठ नागरिक उसे वहन नहीं कर सकता। जब सगे बच्चे दूर देशों या महानगरों में व्यस्त होकर केवल वीडियो कॉल पर ही सारे कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं, तब बुजुर्गों का स्वास्थ्य पूरी तरह बाहरी सहायकों, केयरगिवर्स या वृद्धाश्रम के प्रबंधकों की दया पर निर्भर हो जाता है।
अस्पतालों की लंबी कतारों के बीच अपनों के बिना अकेला खड़ा बुजुर्ग खुद को मानसिक और शारीरिक रूप से पूरी तरह असहाय पाता है।इस गंभीर संकट से उबरने के लिए अब सरकार, प्रशासन और समाज को मिलकर ठोस कदम उठाने होंगे। सबसे पहले ‘माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम’ को अधिक सख्त और प्रभावी बनाया जाना चाहिए, ताकि जो बच्चे आर्थिक रूप से सक्षम होने के बावजूद माता-पिता को अकेला छोड़ देते हैं, उन पर त्वरित कानूनी और दंडात्मक कार्रवाई की जा सके। प्रशासनिक स्तर पर स्थानीय पुलिस को अपने क्षेत्रों में अकेले रह रहे बुजुर्गों का एक डेटाबेस बनाकर ‘बीट पुलिसिंग’ के माध्यम से उनके साथ सीधा और नियमित संवाद रखना चाहिए। इसके अतिरिक्त, सरकार को वृद्धाश्रमों की स्थिति को और अधिक सुदृढ़ करना चाहिए, जहां केवल रहने की जगह नहीं बल्कि वरिष्ठ नागरिकों को उच्च स्तरीय स्वास्थ्य सुविधाएं मुफ्त मिल सकें।
अंततः, सबसे महत्वपूर्ण बदलाव हमारी शिक्षा, संस्कारों और पारिवारिक मूल्यों में होना चाहिए। कोई भी कानून या सरकारी योजना तब तक इस सामाजिक पतन को नहीं रोक सकती, जब तक नई पीढ़ी यह नहीं समझेगी कि बुजुर्ग कोई ‘बोझ’ नहीं, बल्कि अनुभवों का वह अनमोल खजाना हैं जिनकी छांव में ही एक स्वस्थ समाज का निर्माण होता है। एक समाज के रूप में हमारी सफलता इस बात से नहीं आंकी जा सकती कि हमारे पास कितनी ऊंची इमारतें या कितनी आधुनिक तकनीक है, बल्कि इस बात से मापी जानी चाहिए कि हम अपने बुजुर्गों को कितना सुरक्षित और गरिमामय जीवन दे पाते हैं। यदि अंतिम संस्कार जैसी पवित्र और संवेदनशील प्रक्रिया भी वीडियो कॉल की जल्दबाजी का हिस्सा बन जाएगी, तो हम एक बेहद क्रूर और संवेदनहीन समाज में तब्दील हो जाएंगे। समय आ गया है कि हम अपनी सोई हुई अंतरात्मा को जगाएं, ताकि फिर किसी बुजुर्ग को आखिरी सांस तक अपनों का इंतजार न करना पड़े।






