फूल-मालाओं से नहीं, काम से बनती है पहचान

सरकारी सेवा में तबादला और नई नियुक्ति कोई असाधारण घटना नहीं, बल्कि एक सामान्य और सतत प्रशासनिक प्रक्रिया है। वर्षों से यह व्यवस्था प्रशासनिक जरूरतों के अनुसार चलती रही है। लेकिन पिछले कुछ समय से एक नई प्रवृत्ति तेजी से उभरकर सामने आई है। जैसे ही कोई अधिकारी या कर्मचारी किसी क्षेत्र में पदभार ग्रहण करता है, स्वागत-सत्कार की मानो प्रतियोगिता शुरू हो जाती है। फूल-मालाओं के ढेर, बड़े-बड़े गुलदस्ते, दुपट्टे, सम्मान समारोह और फिर इन सबकी तस्वीरों के साथ प्रेस नोटों की बाढ़। ऐसा प्रतीत होता है कि केवल कुर्सी संभालना ही सम्मान पाने की सबसे बड़ी उपलब्धि बन गया है।

सवाल यह है कि क्या केवल नई नियुक्ति सम्मान का आधार हो सकती है?

सम्मान हमेशा व्यक्ति के पद का नहीं, बल्कि उसके कार्यों का होना चाहिए। किसी अधिकारी की वास्तविक पहचान उसके निर्णयों, पारदर्शिता, ईमानदारी, जनहित में किए गए कार्यों और जनता के प्रति उसके व्यवहार से बनती है। यदि किसी अधिकारी ने अपने कार्यकाल में व्यवस्था को बेहतर बनाया, लोगों की समस्याओं का समाधान किया और समाज का विश्वास जीता, तब उसका सम्मान पूरे समाज के लिए प्रेरणा बनता है। लेकिन बिना किसी कार्य के केवल पदभार ग्रहण करते ही फूल-मालाओं से लाद देना किस संस्कृति को जन्म दे रहा है, इस पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।

आज यह स्वागत केवल औपचारिकता तक सीमित नहीं रह गया है। इसके पीछे एक और होड़ दिखाई देती है। स्वागत के बाद तस्वीरें खिंचती हैं, प्रेस नोट तैयार होते हैं और फिर उन्हें प्रकाशित करवाने के लिए मीडिया पर दबाव या आग्रह शुरू हो जाता है। ऐसे में ईमानदारी और निष्पक्षता से काम करने वाले पत्रकार भी असहज स्थिति में आ जाते हैं। हर स्वागत कार्यक्रम को समाचार बनाना क्या वास्तव में पत्रकारिता का दायित्व है, या फिर यह किसी की व्यक्तिगत छवि निर्माण का माध्यम बनता जा रहा है?

बुद्धिजीवियों के बीच भी आजकल यही चर्चा है कि क्या किसी बड़े अधिकारी के साथ मंच साझा कर फोटो खिंचवाना और उसे प्रमुखता से प्रकाशित कराना केवल सम्मान है, या फिर सिस्टम पर अपनी पकड़ और प्रभाव दिखाने का एक अप्रत्यक्ष संदेश? यदि ऐसा है, तो यह प्रवृत्ति भविष्य में प्रशासनिक व्यवस्था के लिए चिंता का विषय बन सकती है।

लोकतंत्र में व्यक्ति नहीं, बल्कि कार्य संस्कृति सर्वोपरि होनी चाहिए। यदि सम्मान करना ही है तो उस अधिकारी का कीजिए जिसने अपने कार्यकाल में जनता का विश्वास जीता हो। जिसने कार्यालय की कार्यप्रणाली सुधारी हो, भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाया हो, आमजन की समस्याओं को प्राथमिकता दी हो और अपने व्यवहार से लोगों के दिलों में स्थान बनाया हो।

दिलचस्प बात यह भी है कि जाते हुए अधिकारी को यदि उसके उत्कृष्ट कार्यों के लिए सम्मानित किया जाए तो वह सम्मान स्वाभाविक और सार्थक लगता है। क्योंकि तब उसके काम की कसौटी पर समाज अपना निर्णय दे चुका होता है। लेकिन आते ही नए अधिकारी के गले में फूल-मालाओं और सम्मान पट्टों की भरमार आखिर किस उपलब्धि का प्रतीक है? क्या यह स्वागत है, भविष्य की अपेक्षाओं का निवेश है, या फिर प्रभाव स्थापित करने की एक औपचारिक शुरुआत?

आखिर समाज को भी यह तय करना होगा कि किसी अधिकारी की सफलता का पैमाना क्या होना चाहिए स्वागत में पहनी गई फूल-मालाओं की संख्या, या फिर जनता के लिए किए गए कार्यों की गुणवत्ता?

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम व्यक्तिपूजा और चापलूसी की संस्कृति से ऊपर उठें। स्वागत हो, लेकिन मर्यादित और औपचारिक। सम्मान हो, लेकिन उपलब्धियों के आधार पर। क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ा पुरस्कार न फूलों की माला है, न मंच पर मिला शॉल और दुपट्टा, बल्कि जनता का विश्वास और उसके चेहरे पर दिखाई देने वाला संतोष है।

जब सम्मान कार्यों का होगा, तभी व्यवस्था मजबूत होगी।
और जब फूलों से अधिक महत्व कर्मों को मिलेगा, तभी लोकतंत्र अपनी वास्तविक गरिमा बनाए रख सकेगा।

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