शेखावाटी क्षेत्र में कथित पत्रकारिता पर उठते सवाल
नगर निकाय चुनाव नजदीक आते ही वार्डों की गलियों में पोस्टर-बैनर के साथ-साथ अब मोबाइल स्क्रीन पर भी चुनावी जंग तेज हो गई है। चुनाव प्रचार का सबसे बड़ा अखाड़ा अब नुक्कड़ सभाएं नहीं, बल्कि फेसबुक, यूट्यूब और इंस्टाग्राम बन गया है। लेकिन इस डिजिटल प्रचार के पीछे एक चिंताजनक ट्रेंड सामने आ रहा है, जो सीधे तौर पर लोकतंत्र की नींव यानी निष्पक्ष जनमत को प्रभावित कर रहा है।
मामला केवल प्रचार का नहीं है, बल्कि खबर के भेष में परोसे जा रहे प्रचार का है।
चुनावी मौसम में सक्रिय होते ‘मौसमी पत्रकार’
शेखावाटी में बीते कुछ दिनों में एक नया ट्रेंड देखने को मिल रहा है। कई ऐसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, जो महीनों तक सन्नाटे में रहते हैं, जिन पर कभी-कभार ही कोई कंटेंट आता है, वे अचानक चुनाव आते ही अति-सक्रिय हो गए हैं। साल भर में 10-15 पोस्ट डालने वाले तथाकथित न्यूज पेज अब रोजाना 4-5 लाइव, इंटरव्यू और ग्राउंड रिपोर्ट डाल रहे हैं।
सवाल यह है कि यह अचानक जागी पत्रकारिता की भावना है या चुनावी अवसर का लाभ?
दूसरी तरफ, ऐसे पत्रकार भी हैं जो पिछले 8-9 सालों से लगातार, दिन में 20-25 खबरों के साथ हर छोटी-बड़ी घटना को कवर कर रहे हैं। सुख-दुख, हादसा, विकास, शिकायत – हर खबर उनके प्लेटफॉर्म पर दिखती है। ऐसे लोगों की पहचान उनके निरंतर काम से होती है। लेकिन मौसमी सक्रियता वाले प्लेटफॉर्म्स की बाढ़ के कारण इस फर्क को आम दर्शक समझ नहीं पा रहा है।
ग्राउंड रिपोर्ट के नाम पर स्क्रिप्टेड इंटरव्यू का खेल
सबसे बड़ा खेल ‘ग्राउंड रिपोर्ट’ के नाम पर खेला जा रहा है। तरीका बेहद सरल है।
वार्ड पार्षद का चुनाव लड़ रहा प्रत्याशी खुद को सीधे तौर पर प्रमोट नहीं करता। वह सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर या खुद को पत्रकार बताने वाले व्यक्ति से संपर्क करता है। फिर एक जगह तय की जाती है। वहां पहले से ही प्रत्याशी के 10-15 समर्थक मौजूद होते हैं। इन्फ्लुएंसर कैमरा ऑन करता है, समर्थकों से पूछता है – “इस बार वार्ड में किसका माहौल है?” जवाब पहले से तय होता है – एक ही प्रत्याशी का नाम। इसे ‘जनता की राय’, ‘ग्राउंड जीरो से रिपोर्ट’ जैसे भारी-भरकम शीर्षकों के साथ परोस दिया जाता है।
देखने वाले को लगता है कि यह सच में जनता की नब्ज है, जबकि हकीकत में यह एक प्रायोजित शो होता है। कैमरे के पीछे की भीड़ में विरोधी पक्ष का एक भी व्यक्ति नहीं होता। विपक्ष की आवाज को पूरी तरह से एडिट कर दिया जाता है या उसे कवर ही नहीं किया जाता।
कुछ मामलों में तो प्रत्याशी के ही करीबी व्यक्ति पत्रकार बनकर इंटरव्यू ले रहे हैं। एक ही व्यक्ति कैमरामैन है, वही रिपोर्टर है और वही चैनल का मालिक भी।
सरकारी तंत्र और आचार संहिता को चकमा
यह खेल इतनी सफाई से खेला जा रहा है कि सरकारी तंत्र भी इसे पकड़ नहीं पा रहा। प्रिंट या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पेड न्यूज पर नजर रखने के लिए मॉनिटरिंग कमेटियां हैं, लेकिन सोशल मीडिया, खासकर लोकल फेसबुक पेज और यूट्यूब चैनल अभी भी लगभग इस निगरानी के दायरे से बाहर हैं।
आचार संहिता में खर्च की सीमा तय है, लेकिन यह डिजिटल पेड प्रमोशन किसी हिसाब-किताब में नहीं आता। प्रत्याशी बड़ी आसानी से तंत्र को चकमा देकर जनमत को अपने पक्ष में मोड़ रहा है। यह सीधे-सीधे मतदाताओं को गुमराह करना है।
एकतरफा कवरेज से खुद ही संदेह के घेरे में आते प्लेटफॉर्म
किसी भी निष्पक्ष न्यूज प्लेटफॉर्म की पहचान उसकी संतुलित कवरेज से होती है। यदि किसी वार्ड में 5 प्रत्याशी मैदान में हैं, तो निष्पक्ष पत्रकार पांचों के पास जाएगा।
लेकिन जब एक ही प्लेटफॉर्म पर लगातार एक हफ्ते तक सिर्फ एक ही प्रत्याशी की ‘जय-जयकार’ वाली खबरें चलें, उसके पक्ष में ही इंटरव्यू दिखें, और बाकी प्रत्याशियों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया जाए, तो वह प्लेटफॉर्म खुद-ब-खुद संदेह के घेरे में आ जाता है। दर्शक भले ही अनजान हो, लेकिन धीरे-धीरे उसे समझ आने लगता है कि यह खबर नहीं, प्रचार है।
आज नई पीढ़ी का प्रिंट मीडिया से मोह भंग हो चुका है और बड़े इलेक्ट्रॉनिक चैनलों से भी उसका विश्वास उठ रहा है। लोग स्थानीय खबरों के लिए सोशल मीडिया पर निर्भर हैं। ऐसे में यदि सोशल मीडिया पर भी प्रायोजित खबरें ही परोसी जाएंगी, तो जनता खबर के लिए कहां जाएगी?
असली पत्रकारिता पर संकट
इस पूरे खेल का सबसे बड़ा नुकसान उन लोगों को हो रहा है जो ईमानदारी से, सालों से इस फील्ड में काम कर रहे हैं। एक-दो मौसमी और प्रायोजित कंटेंट चलाने वालों के कारण हर सोशल मीडिया पत्रकार को शक की नजर से देखा जाने लगा है। लोग कमेंट में लिखने लगे हैं – “कितने में बिका है?”, “ये तो उसका आदमी है।”
वार्ड की असली समस्याओं से कोई लेना-देना नहीं
यह सबसे बड़ा सवाल है। नगर निकाय चुनाव का मूल उद्देश्य क्या है? अच्छे जनप्रतिनिधि का चुनाव। और अच्छे जनप्रतिनिधि की पहचान कैसे होगी?
उसकी पहचान के लिए दो तरह की स्टोरी सबसे जरूरी हैं, जो इन प्लेटफॉर्म्स पर कभी देखने को नहीं मिलतीं –
- पिछले जनप्रतिनिधि ने कितना काम किया?
पिछले 5 साल में निवर्तमान पार्षद ने वार्ड में कितनी सड़कें बनवाईं? कितनी लाइटें लगवाईं? जलभराव की समस्या के लिए क्या किया? बोर्ड की बैठकों में वार्ड की आवाज कितनी बार उठाई? इसका कोई हिसाब-किताब, कोई ऑडिट रिपोर्ट इन मौसमी पत्रकारों के पास नहीं है। - आगामी जनप्रतिनिधि से जनता की क्या अपेक्षाएं हैं?
वार्ड के बुजुर्ग, महिलाएं, युवा, दुकानदार – वे नए पार्षद से क्या चाहते हैं? उनकी प्राथमिकता क्या है? नाली या पार्क? पानी या सफाई? इस पर कभी कोई चर्चा नहीं होती।
यह स्थिति लोकतंत्र के लिए घातक है। जब खबर और विज्ञापन के बीच की लकीर मिट जाएगी, तो मतदाता सही फैसला कैसे कर पाएगा?
समय आ गया है कि दर्शक भी जागरूक बने। कोई भी ग्राउंड रिपोर्ट देखकर तुरंत भरोसा न करें। देखें कि क्या रिपोर्टर ने दोनों पक्षों को समान मौका दिया है? क्या भीड़ में हर वर्ग के लोग हैं या सिर्फ एक ही प्रत्याशी के समर्थक? क्या वह चैनल साल भर सक्रिय रहता है या सिर्फ चुनाव में ही दिखता है?
और साथ ही, चुनाव आयोग और प्रशासन को भी सोशल मीडिया मॉनिटरिंग को और सख्त करना होगा। खबर के नाम पर चल रहे इस अदृश्य प्रचार पर लगाम लगाना जरूरी है, ताकि वार्ड की सरकार चुनने का अधिकार सच में जनता के हाथ में रहे, न कि प्रायोजित कंटेंट के हाथ में।






