राजस्थान का सीकर आज देश के प्रमुख कोचिंग केंद्रों में गिना जाता है। हर वर्ष हजारों विद्यार्थी डॉक्टर, इंजीनियर और सरकारी अधिकारी बनने का सपना लेकर यहां आते हैं। लेकिन सफलता की इस दौड़ के साथ मानसिक तनाव, अवसाद और आत्महत्या जैसी गंभीर समस्याएं भी तेजी से सामने आ रही हैं। हाल के वर्षों में प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितताओं, पेपर लीक और परीक्षा रद्द होने की घटनाओं ने छात्रों की चिंता को और बढ़ा दिया है। NEET से जुड़े विवादों और पुनर्परीक्षाओं ने लाखों विद्यार्थियों को मानसिक रूप से प्रभावित किया है। एक विद्यार्थी कई वर्षों तक कठिन परिश्रम करता है। जब परीक्षा की निष्पक्षता पर प्रश्न उठते हैं या परीक्षा रद्द होती है, तो उसे लगता है कि उसकी मेहनत व्यर्थ चली गई। परिवार की अपेक्षाएं, आर्थिक दबाव और समाज में सफलता को लेकर बनी धारणाएं इस तनाव को और गहरा कर देती हैं। कुछ मामलों में यह निराशा इतनी बढ़ जाती है कि विद्यार्थी आत्मघाती कदम तक उठा लेते हैं। विशेषज्ञ लंबे समय से चेतावनी देते रहे हैं कि प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़ा मानसिक दबाव युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है।
समस्या केवल विद्यार्थियों की नहीं है, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र की है। जब सफलता को केवल अंकों और रैंक से मापा जाता है, तब असफलता को जीवन का अंत समझने की प्रवृत्ति बढ़ती है। यह सोच बदलनी होगी। प्रत्येक विद्यार्थी की प्रतिभा अलग होती है और जीवन में सफलता के अनेक मार्ग हैं। इस संकट की रोकथाम के लिए बहुआयामी प्रयास आवश्यक हैं। सबसे पहले, परीक्षा प्रणाली को अधिक पारदर्शी, सुरक्षित और विश्वसनीय बनाया जाए ताकि पेपर लीक और अनियमितताओं की घटनाओं पर रोक लग सके। सरकार और परीक्षा एजेंसियों को समयबद्ध तथा जवाबदेह व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए।
दूसरा, कोचिंग संस्थानों में नियमित मनोवैज्ञानिक परामर्श (काउंसलिंग) और मानसिक स्वास्थ्य सहायता उपलब्ध कराई जानी चाहिए। विद्यार्थियों को तनाव प्रबंधन, असफलता से सीखने और भावनात्मक संतुलन बनाए रखने का प्रशिक्षण दिया जाए। तीसरा, अभिभावकों को भी समझना होगा कि बच्चों पर अत्यधिक अपेक्षाओं का बोझ न डालें। प्रोत्साहन दें, लेकिन तुलना और दबाव से बचें।
अंततः, समाज को यह संदेश देना होगा कि एक परीक्षा जीवन से बड़ी नहीं हो सकती। युवाओं के सपनों की रक्षा केवल बेहतर शिक्षा से नहीं, बल्कि संवेदनशील वातावरण से भी होगी। यदि हम समय रहते इस समस्या को गंभीरता से नहीं लेते, तो प्रतिभाशाली युवाओं को खोने का सिलसिला जारी रह सकता है। फिल्म Pushpa: The Rise का चर्चित संदेश “मैं झुकेगा नहीं” युवाओं के लिए केवल एक संवाद नहीं, बल्कि कठिन परिस्थितियों में धैर्य और संघर्ष का प्रतीक बन सकता है। हालांकि वास्तविक जीवन में इसका अर्थ अहंकार नहीं, बल्कि विपरीत परिस्थितियों के सामने हिम्मत न हारना है।
संपादकीय लेख : नीरज सैनी [ संपादक, शेखावाटी लाइव मीडिया ग्रुप एवं शेखावाटी दर्पण समाचार पत्र ]





