शहर की भागदौड़ से दूर चूरू जिले के रतनगढ़ क्षेत्र का लोहा गांव अपने गौरवशाली इतिहास और सांस्कृतिक विरासत के लिए जाना जाता है।
सन 1698 में लाखन सिंह के नाम पर बसे इस गांव में आज करीब 4500 लोग निवास करते हैं, जबकि मतदाताओं की संख्या लगभग 3500 है।
सभी समुदायों की बसावट
गांव में जाट, अनुसूचित जाति और अल्पसंख्यक समुदाय की अधिक आबादी है।
खेती, सरकारी नौकरी और विदेशों में रोजगार यहां के लोगों की आजीविका का मुख्य साधन है।
लाख की चूड़ियों के कारोबार से पहचान
लोहा गांव के करीब 200 परिवार लाख की चूड़ियों का व्यवसाय करते हैं।
यहां बनने वाली चूड़ियां राजस्थान ही नहीं बल्कि देश के कई हिस्सों में भेजी जाती हैं।
गणगौर से जुड़ी ऐतिहासिक कहानी
गांव का इतिहास बीकानेर रियासत से भी जुड़ा हुआ है।
कहा जाता है कि जब जैसलमेर के भाटी शासक गणगौर को बीकानेर से ले गए थे, तब लाखन सिंह अपने 50 साथियों के साथ गणगौर को वापस लेकर आए थे।
इससे खुश होकर बीकानेर रियासत के महाराजा अनोपसिंह ने वर्ष 1698 में यह गांव उपहार स्वरूप लाखन सिंह को दे दिया।
तभी से गांव का नाम लोहा पड़ा और गणगौर गीतों में लाखन सिंह का उल्लेख आज भी किया जाता है।
पाकिस्तान से जुड़ा खास रिश्ता
लोहा गांव का संबंध पाकिस्तान से भी जुड़ा हुआ है।
गांव निवासी मुंशी खां विभाजन के दौरान अपने परिवार सहित पाकिस्तान चले गए थे। उनकी बेटी रेशमा आगे चलकर पाकिस्तान की मशहूर गायिका बनीं।
आज भी रेशमा का पैतृक घर गांव लोहा में मौजूद है।
गांव में आधुनिक सुविधाएं भी मौजूद
गांव में बैंक, खेलो इंडिया हैंडबॉल केंद्र, अंग्रेजी, हिंदी और संस्कृत स्कूल, आंगनबाड़ी केंद्र, रेलवे स्टेशन, पार्क, जोहड़, पशु चिकित्सालय और उपस्वास्थ्य केंद्र जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं।
राजीव गांधी सेवा केंद्र सहित कई विकास कार्य पंचायत द्वारा करवाए गए हैं।
पानी निकासी बनी बड़ी समस्या
विकास कार्यों के बावजूद गांव में पानी निकासी की समस्या अब भी गंभीर बनी हुई है।
कई जगहों पर गंदा पानी आम रास्तों पर बहता दिखाई देता है, जिससे ग्रामीणों को परेशानी का सामना करना पड़ता है।
खेलों में बेटियों ने बढ़ाया मान
लोहा गांव की बेटियों ने हैंडबॉल खेल के माध्यम से गांव का नाम राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाया है।
गांव की खिलाड़ी बेटियां जिला, प्रदेश और देश स्तर पर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर चुकी हैं।




