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भारतीय संस्कृति का मूल है संस्कृत – लाम्बा

संस्कृत में भारतीय संस्कृति की जड़े है, इसी में भारत देश के पुरातन अतीत की धरोधर है। यह उद्गार स्थानीय लाम्बा कोचिंग कॉलेज परिसर में आयोजित भारतीय संस्कृति व संस्कृत विषय पर सेमीनार में कॉलेज के निदेशक शुभकरण लाम्बा ने व्यक्त किये। उन्होंने कहा कि संस्कृत में ऋषियों द्वारा अनवेषित ज्ञान-विज्ञान का सम्पूर्ण खजाना है। उन्होंने कहा कि संस्कृत भाषा में हम सब भारतवासियों की सांस्कृतिक विरासत सुरक्षित है। संस्कृत की उपेक्षा हमे उस विरासत से अलग कर देती है। संस्कृत का अर्थ है शुद्ध, परिष्कृत, श्रेष्ठ, सुगढ़ आदि। इसे देववाणी भी कहा जाता है। इसकी गरिमा से अनजान लोग इसे केवल पूजा पाठ व कर्मकांड से जुड़ा मान लेते है। उन्होंने कहा कि अनजान लोग अपने अज्ञान के चलते वे इसे अवैज्ञानिक व अनुपयोगी ठहराने की कोशिश करते है जबकि बड़ी सच्चायी यह है कि इसके अन्तर्गत सुरक्षित षड्दर्शनो को जाने बिना हम उस चिन्तन तक नही पहुंच सकते जो भारत भूमि की संस्कृति का मूल आधार बना हुआ है। उन्होंने कहा कि संस्कृत हजारो वर्षो पुरानी सभ्यता का सजीव व मूर्त रूप है। यह भाषा किसी न किसी रूप में केरल से चलकर कश्मीर तक और कामरूप से चलकर सौराष्ट्र तक सभी क्षेत्रो के लोगो के जीवन में महत्वपूर्ण व पावन क्षणों में उपस्थित रहती है। यह अंदर से बिना प्रकट हुये सबको बांधने का काम करती है और ज्ञान के आलोक में सबको प्रकाशित करती है। संस्कृत हम सब भारतवासियों की साझी विरासत है और इस अर्थ में अत्यन्त व्यापक है कि यह स्थानीयता के आग्रह से पार जाती है। इसमें इतिहास का पश्चिमी मोह नही है और देश-काल का अतिक्रमण कर सबका समावेशन कर पाने की क्षमता इसमें विद्यमान है। इसके सरोकार व्यापक है, यह साहित्य, पर्यावरण, शिक्षा, ज्ञान तथा मानव गरीमा की रक्षा करने के लिये तत्पर है। शिक्षाविद् टेकचंद शर्मा ने कहा कि संस्कृत भारतीय मानव विकास क्रम से जुड़ी भाषा है। यह भाषा देश की अन्य भाषाओं का उदगम स्त्रोत है। छात्र-छात्राएं संस्कृत से जुड़ेंगे तो देश की सनातम परम्पराओं से भी परिचत होंगे तथा प्रकृति से भी उनका नाता जुड़ेगा। संस्कृत देश की सबसे प्राचीनतम भाषा होने के साथ-साथ भाष विज्ञान की दृष्टि से भी सर्वश्रेष्ठ मानी गयी है। इस अवसर पर बड़ी संख्या में प्रशिक्षणार्थी उपस्थित थे।

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