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जेजेटी विश्वविद्यालय में महावीर जयंती पर हुई संगोष्ठी

झुंझुनू, श्री जे. जे. टी विश्वविद्यालय में आज हिंदी विभाग एवं राजनीतिक विभाग के संयुक्त तत्वावधान में महावीर जयंती के उपलक्ष में संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ भगवान महावीर की प्रतिमा पर पुष्पांजलि के साथ हुआ। कार्यक्रम की संयोजक डॉ. सुशीला दुबे ने महावीर जयंती के उपलक्ष्य में भगवान महावीर के व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि डॉ. धनेश कुमार मीणा ने बताया कि भगवान महावीर 24वें और अंतिम तीर्थंकर हैं। जैन परम्परानुसार तीर्थंकर ऐसा ज्ञानी जीवात्मा होता है जो कि मानव के चोले में जन्म लेकर ध्यान तथा आत्मानुभूति के द्वारा ज्ञान प्राप्त करता है। तीर्थंकरों को अरिहंत भी कहा जाता है अर्थात् जिन्होंने क्रोध, लालच अथवा अहम् जैसे आंतरिक शत्रुओं को हरा दिया।भगवान महावीर ने मानव शरीर में एक जाग्रत जीवात्मा के रूप में देवत्व प्राप्त किया। भगवान महावीर ने जीवन की गुणवत्ता में सुधार के लिए एक दर्शन का प्रतिपादन किया।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि शिक्षा विभाग के अधिष्ठाता डॉ राम प्रताप सैनी ने महावीर जयंती के कार्यक्रम में बताया कि आध्यात्मिक जागरूकता को बढ़ावा देना भगवान श्री महावीर की शिक्षाओं के माध्यम से शांति, चिंतन और आध्यात्मिक विकास का वातावरण बनाना। सांस्कृतिक भागीदारी को प्रोत्साहित करना, विश्वविद्यालय समुदाय को सांस्कृतिक गतिविधियों, प्रार्थनाओं और चर्चाओं में शामिल करना जो श्री महावीर जयंती के महत्व और गरिमा को बढ़ाता है।
कार्यक्रम की अध्यक्षा डॉ सविता सांगवान ने बताया कि महावीर की वार्तायें, उनकी शिक्षायें सभी त्रैकालिक हैं। वे सभी काल के लिये समान रूप से आवश्यक हैं। महावीर के दर्शन में अहिंसा के तत्व को सबसे बड़ा तत्व बताते हुये उन्होंने कहा कि अहिंसा को पुस्तकों तक सीमित नहीं रखना चाहिये, क्योंकि महावीर ने अहिंसा का प्रतिपादन पराकाष्ठा तक किया था। महावीर के शास्त्र के कुछ ही तत्वों को जीवन में अपने आचरण पालन में उतार लेने से जीवन सफल हो सकता है। जो भी काम करो, उसमें तल्लीनता से पूरे मन से करना चाहिये।
हिंदी विभाग से डॉ. बिकेश सिंह ने कहा किभगवान महावीर को जैन धर्म के चौबीसवें और अंतिम तीर्थंकर के रूप में जाना जाता है। उनका जन्म 599 ईसा पूर्व बिहार के कुंडग्राम में हुआ था। उन्होंने 30 साल की उम्र में संन्यास ले लिया और 12 साल की कठोर तपस्या के बाद उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई। भगवान महावीर ने अहिंसा को सर्वोच्च आदर्श माना।
कार्यक्रम के अंत में संस्कृत विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. रविंद्र भोजक ने महावीर स्वामी द्वारा दिए गए मंत्रों का उच्चारण करके कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई।
कार्यक्रम में मंच संचालन सह- आचार्य डॉ. विजय कुमार धतरवाल व धन्यवाद ज्ञापित डॉ. सुमित कुमार गुप्ता ने किया। कार्यक्रम में डॉ पिंकी,डॉ सोनू सारण, डॉ. कीर्ति वर्मा , डॉ रचना शर्मा, डॉ सद्दाम हुसैन, डा.विंध्यवासिनी ,कार्यक्रम में कला व मानविकी संकाय के सभी शिक्षकगण व विद्यार्थी मौजूद थे।

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