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गोबर के गणेश हरेंगे पर्यावरण के क्लेश

गोबर से बनी गणेश की प्रतिमा कर रही लोगों को आकर्षित

पर्यावरण संरक्षण की अनूठी पहल

रेनवाल, (नितिश सांवरिया) गणेश जन्मोत्सव की तैयारियों को लेकर श्रद्धालु जुटे हुए हैं, हालांकि कोरोना वैश्विक महामारी के चलते इस बार मंदिरों में भव्य आयोजन नहीं किया जाएगा। लेकिन शहर के कई बड़े मंदिरों में श्रद्धालुओं के लिए ऑनलाइन दर्शन की व्यवस्था की गई है। वहीं जयपुर जिले के ग्राम आसलपुर में स्थित धेनुकृपा गोवर्ती पंचगव्य उत्पाद ग्रामोद्योग संस्था की ओर से बनाई जा रही गोबर के गणेश की प्रतिमा सभी के लिए आकर्षक का केंद्र बनी हुई है। दरअसल संस्था की ओर से हर साल गोबर की प्रतिमा बनाई जाती है। संस्था के सदस्य भागचंद कुमावत ने बताया कि हमारा मूल उद्देश्य प्रकृति को बचाने के साथ-साथ गौ माता को बचाना है। प्रकृति का संतुलन बनाए रखने के लिए गोबर के गणेश जी बनाए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि पीओपी की मूर्तियों में हानिकारक केमिकल होने की वजह से वो जल को प्रदूषित करती है। जिसके कारण जो जीव जल में रहते हैं वह नष्ट हो जाते हैं। पीओपी व प्लास्टिक से बनी प्रतिमाएं नदी और तालाब में समाप्त नहीं हो पाती। इसके साथ ही इन मूर्तियों में रासायनिक रंगों का भी इस्तेमाल किया जाता है। जो पानी में गुल नहीं पाने की वजह से नदी के किनारे आ जाती है। जिससे नदी में पानी पीने वाले पशुओं की मृत्यु हो जाती है। गोबर से बनी हुई मूर्तियां जल में घुलनशील होती है जो कि जल में गुल कर जल में रहने वाले जीवो का आहार बन जाती है। जिसके कारण जल प्रदूषित भी नहीं होता है। उन्होंने यह कहा कि पिछले 3 वर्षों से गोबर से कई उत्पाद बनाते आ रहे हैं। गोबर गणेश जी, ईट, अगरबत्ती, दीपक बनाते हैं। कोरोना काल के दौरान गौशाला में हर साल होने वाले गणेश विसर्जन कार्यक्रम स्थगित कर दिया गया है। जिससे सामूहिक रूप से होने वाले कार्यक्रम में श्रद्धालु हिस्सा नहीं ले पाएंगे और अपने घरों में ही गणेश जी का विसर्जन करेंगे। गोबर से बनने वाली मूर्तियों की कीमत भी बहुत कम होती है। जबकि पीओपी से बनने वाली मूर्तियां काफी अधिक महंगी मिलती है। जिससे हर कोई आसानी से नही खरीद पाता। गोबर से बने हुए गणेश आसानी से बाजार में भी अब सुलभ होने लगे हैं । साथ ही पीओपी की तुलना से बनने वाले मूर्तियों से सस्ते भी मिलते हैं इसके साथ ही गोबर के गणेश पर्यावरण का भी हारेंगे क्लेश ।

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