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जातियों के विनाश से ही देश का विकास संभव- मेघवंशी

सामाजिक कार्यकर्ता एवं लेखक भंवर मेघवंशी ने कहा- समरसता एक खूबसूरत धोखा

चूरू, प्रयास संस्थान की ओर से रविवार को सूचना केंद्र में हुए कार्यक्रम ‘किताब’ में रूबरू हुए सामाजिक कार्यकर्ता एवं लेखक भंवर मेघवंशी ने सामाजिक परिदृश्य पर चर्चा की। युवा लेखक उम्मेद गोठवाल से बातचीत एवं श्रोताओं के सवालों के जवाब देते हुए मेघवंशी ने कहा कि हमें बाबा साहब की इस बात की तरफ लौटना ही होगा कि जातियों के विनाश से ही देश व समाज का समुचित विकास एवं समानतामूलक व्यवस्था की स्थापना संभव है। मेघवंशी ने कहा कि हम अपनी जातियों को मजबूत करने में लगे रहते हैं, जातियों में ही कम्फर्ट फील करते हैं जबकि सच यह है कि आपके विरोध में सबसे ज्यादा आपकी ही जाति के लोग होते हैं। हाल यह है कि जाति खुद एक राष्ट्र हो गई है, राष्ट्र से ऊपर हो गई है। हर जाति की अपनी पंचायत, कुए, धर्मशाला, सेनाएं हो गई हैं जो खुद को राष्ट्र की सेना से भी ऊपर समझती हैं। जाति का तत्व राष्ट्र के तत्व पर भारी पड़ रहा है। हम वसुधैव कुटुंबकम का मंत्र भूल चुके हैं। पशु की रक्षा के नाम पर इंसानों का खून बहा रहे हैं। हाल यह है कि गौमूत्र पी लेंगे, लेकिन दलित के हाथ का पानी नहीं पीएंगे। सभी धर्मों में जाति की संरचना है। धर्मांतरण के बाद भी जाति पीछा नहीं छोड़ती है। हम सभी को इस पर गंभीरता से सोचना पड़ेगा। हमारा लक्ष्य यह होना चाहिए कि जाति, धर्म के भेद खत्म हों और भारत एक श्रेष्ठ देश बने। हम सभी भारतीय हैं और यहीं रहने वाले हैं। कोई यहां से जाने वाला नहीं। न हम किसी को निकाल सकते हैं न दूसरा कोई हमें यहां से निकाल सकता है। हम इस मिट्टी से पैदा हुए हैं और इसी में मिल जाएंगे। हमें यह नफरत का वातावरण खत्म करना है। विश्व कहां जा रहा है और हम किन छोटी-छोटी बातों में उलझे पड़े हैं। संवाद के जरिए अविश्वास खत्म होना चाहिए। असहमतियां सुनी जानी चाहिए। महिलाओं के सवालों का जवाब देते हुए मेघवंशी ने कहा कि जाति ने सबसे ज्यादा औरतों को दबाया है, औरतों की जिंदगी में सब कुछ जाति तय करती है कि उन्हें कैसा जीवन बिताना है। इससे पूर्व प्रयास संस्थान के अध्यक्ष दुलाराम सहारण ने स्वागत किया और आयोजन की रूपरेखा पर प्रकाश डाला। युवा लेखक कुमार अजय ने आभार जताया। प्रख्यात चित्रकार रामकिशन अडिग एवं देवकरण जोशी ने मेघवंशी को प्रतीन चिन्ह भेंट किया। इस दौरान प्रो. केसी सोनी, रविंद्र बुढानिया, प्रो सुरेश कुमार, डॉ निरंजन चिरानिया, रतन लाल जांगिड़, जमील चौहान, पूर्व सरपंच रमेश न्यौल, पूर्व प्रधान रामनाथ कस्वां, पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष सुनील मेघवाल, सफी मोहम्मद गांधी, एडवोकेश सुरेश कल्ला, लीलाधर चंदेल, युवा लेखक पवन अनाम, युवा रचनाकार डिंपल नाहटा, डिंपल राठौड़, बुधमल सैनी, किशन छापूनियां, बबीता कंवर, मनराज कांटीवाल, सांवर मल बरोड़,, नरेंद्र शर्मा, सुरेश जिनागल, रामकिशन अडिग, बेगराज खरींटा, देवकरण जोशी, सद्दाम हुसैन, मो अकरम, घासीराम बरवड, बीरबल नोखवाल सहित बड़ी संख्या में गणमान्य नागरिक मौजूद थे।
-समरसता एक खूबखूरत धोखा
एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि समरसता शब्द एक खूबसूरत धोखा है कि हम जिस हाल में हैं, उसी में रहते रहें और कोई डिमांड नहीं करें। हमें समानता की तरफ चलना पड़ेगा। हमें बराबरी वाला समाज बनाना पड़ेगा। वह समाज नहीं, जिसमें जन्म से ही तय कर दिया जाए कि यह श्रेष्ठ है और यह निकृष्ट है। एक कारसेवक के रूप में और एक सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर अपनी जिंदगी से जुड़े सवालों के जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि मैं अपने लेखक पर सामाजिक कार्यकर्ता को तरजीह देता हूं, लेखन यदि सामाजिक बदलाव में कुछ सहयोगी बनता है तो अच्छी बात है। मैं रच नहीं रहा, केवल डोक्योमेंटेंशन कर रहा हूं। आप मुझे अर्जीनवीस के रूप में देख सकते हैं।
-राजनीति में जाने का इच्छुक नहीं
एक सवाल के जवाब में मेघवंशी ने कह कि जो चुनाव की राजनीति है, उसमें जाने का मैं इच्छुक नहीं। लोक राजनीति हमारा उद्देश्य है। राजस्थान के पिछले एक हजार साल के इतिहास में केवल मीरा ही विद्रोह का उदाहरण है, जो भी भक्ति से लिपटा हुआ है। जहां बात की शुरुआत ही अन्नदाता, खम्माघणी, हुकुम से होती है, वहां किसी क्रांति का जन्म कैसे हो सकता है। उन्होंने कहा कि मैं ऎसे ही सड़क पर लोगों के अधिकारों के लिए लड़ते हुए अपना बाकी जीवन बिताना चाहता हूं। उन्होंने युवाओं को संबोधित करते हुए कहा कि सोशल मीडिया ने गंदगी फैला रखी है। पढ़ना, सोचना कोई चाहता नहीं है। जो साहित्य बराबरी की बात करता है, वह साहित्य युवाओं को पढ़ना चाहिए।

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