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क्रोध, वासना और लालच में फसा मनुष्य कभी अपना उद्धार नहीं कर सकता – देवकीनन्दन ठाकुर

श्री जेजेटी यूनिवर्सिटी विद्या नगरी के खेल मैदान पर चल रही श्रीमद् भागवत कथा के छठे दिन

झुंझुनू, श्री जेजेटी यूनिवर्सिटी विद्या नगरी के खेल मैदान पर चल रही श्रीमद् भागवत कथा के छठे दिन यजमान के रूप में जेजेटी यूनिवर्सिटी के कुलाधिपति विनोद टीबड़ेवाला बालकृष्ण टीबड़ेवाला रमाकांत टीबड़ेवाला हनुमान प्रसाद विशाल टीबड़ेवाला ओम गोयंका मौजूद रहे आज की कथा में महामण्डलेश्वर, वेंकटेश लोहार्गल पीठाधीश्वर, लोहार्गल धाम, स्वामी अश्विनी दास जी महाराज कथा के मध्य में पधारे और व्यास पीठ से आशीर्वाद प्राप्त किया। कथा में महाराज श्री ने कहा कि जन्म के बाद मृत्यु भी वैसे ही निश्चित है जैसे मृत्यु के बाद जन्म निश्चित है। अगर आपका जन्म हुआ है तो मृत्यु होगी अगर मृत्यु हुई है तो जन्म होगा अगर आपकी मुक्ति न हो पायी तो। इसीलिए कभी भी मृत्यु पर कभी भी शोक नहीं करना चाहिए। क्रोध, वासना और लालच ये तीनों मनुष्य के सबसे बड़े शत्रु हैं। अगर मनुष्य इनके वश में है तो वो कभी भी अपना उद्धार नहीं कर सकता है। ये महत्वपूर्ण नहीं है कि आप कितना जिए, महत्वपूर्ण यह है आप कैसे जिए। आप बिना सत्संग के बुद्धिमान तो बन सकते हैं पर विवेकमान नहीं बन सकते हैं। हमें विवेकमान होना चाहिए क्यूंकि विवेकमान व्यक्ति न किसी का बुरा करता है न किसी का बुरा होने देता है। जब तक हम अपनी संस्कृति और सनातन को नहीं समझेंगे तब तक हमारे बच्चे भी हमारी संस्कृति को नहीं समझेंगे। मनुष्य जीवन में संत और बसंत दोनों महत्वपूर्ण हैं क्यूंकि जब बसंत आता है तो संसार महक जाता है और जब संत आता है तो जीवन महक जाता है। आज का मनुष्य जो सबसे बड़ी ग़लती करता है वो है कि अपनी मर्ज़ी के अनुसार धर्म का अर्थ निकालता है। वह जिसमें खुद को आरामदेह समझता है उसी को धर्म का नाम दे देता है।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज जी ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि बिना साधना के भगवान का सानिध्य नहीं मिलता। द्वापर युग में गोपियों को भगवान श्री कृष्ण का सानिध्य इसलिए मिला, क्योंकि वे त्रेता युग में ऋषि – मुनि के जन्म में भगवान के सानिध्य की इच्छा को लेकर कठोर साधना की थी। शुद्ध भाव से की गई परमात्मा की भक्ति सभी सिद्धियों को देने वाली है। जितना समय हम इस दुनिया को देते हैं, उसका 5% भी यदि भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में लगाएं तो भगवान की कृपा निश्चित मिलेगी। कथा में सभी भक्तों ने कृष्ण – रुक्मणी विवाह के दर्शन कर बधाईयों का आनंद लिया। कथा में रुक्मणी विवाह की झांकी सजाई गई जिसे खूब सराहा गया।

श्रीमद् भागवत कथा के एसप्तम दिवस द्वारिका लीला, सुदामा चरित्र, परीक्षित मोक्ष, व्यास पूजन पूर्णाहुति का वृतांत सुनाया जाएगा। इस अवसर पर कथा में मुंबई से आए प्रवासी राधेश्याम जसरा पुरिया साकेत सोनथलिया महावीर प्रसाद गुप्ता हनुमान प्रसाद बगड़िया रामअवतार अग्रवाल करौली परागों प्रेमलता टीबड़ेवाला उमा देवी टीवडेवाला कावेरी टीबड़े वाला सीता देवी कांता देवी सहित दूरदराज से आए चिकित्सक वह गणमान्य लोग बड़ी संख्या में मौजूद थे।

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