झुंझुनूं से सांसद बृजेंद्र सिंह ओला ने केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तुत बजट 2026–27 को देश के किसानों, युवाओं, महिलाओं तथा SC-ST-OBC वर्गों के साथ छलावा बताया है।
उन्होंने कहा कि यह बजट घोर निराशाजनक, दिशाहीन और ज़मीनी सच्चाइयों से पूरी तरह कटा हुआ है।
5 प्रतिशत अमीरों का बजट करार
सांसद ओला ने कहा
यह बजट देश की 95 प्रतिशत आबादी के लिए नहीं, बल्कि केवल 5 प्रतिशत संपन्न लोगों और बड़े कॉरपोरेट हितों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। जनता की समस्याओं का समाधान करने के बजाय यह सिर्फ आंकड़ों और खोखले भाषणों तक सीमित है।
किसानों के साथ फिर हुआ धोखा
उन्होंने कहा कि किसानों की आय दोगुनी करने का वादा एक बार फिर खोखला साबित हुआ है।
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न कोई स्पष्ट रोडमैप
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न समय-सीमा
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न ही एमएसपी को कानूनी गारंटी
डीज़ल, खाद, बीज और कीटनाशकों की बढ़ती कीमतों से किसान पहले ही परेशान हैं, लेकिन बजट में उनकी आय और सुरक्षा को लेकर सरकार पूरी तरह मौन है।
सिंचाई योजनाओं और फसल बीमा में वर्षों से चली आ रही अव्यवस्था और भ्रष्टाचार को सुधारने का भी कोई ठोस इरादा नहीं दिखता।
युवाओं को रोजगार नहीं, सिर्फ झूठी उम्मीदें
सांसद ओला ने कहा कि देश का युवा गंभीर बेरोज़गारी संकट से जूझ रहा है, लेकिन
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न सरकारी भर्तियों का कोई जिक्र
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न निजी क्षेत्र में रोजगार सृजन के लिए प्रभावी प्रोत्साहन
यह बजट युवाओं को रोजगार नहीं, केवल झूठी उम्मीदें देता है।
महिलाओं के सशक्तिकरण पर चुप्पी
महिलाओं के नाम पर बजट को पूरी तरह खाली बताते हुए उन्होंने कहा
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न महिला रोजगार
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न सुरक्षा
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न स्थायी आय से जुड़े ठोस प्रावधान
न कार्यस्थल सुरक्षा को लेकर कोई स्पष्ट योजना है और न ही कौशल आधारित नौकरियों का कोई रोडमैप।
SC-ST-OBC वर्ग उपेक्षित
सांसद ने कहा कि SC, ST और OBC वर्गों के लिए शिक्षा, रोजगार और सामाजिक न्याय से जुड़े कोई विशेष एवं प्रभावी प्रावधान बजट में शामिल नहीं किए गए हैं।
यह साफ दिखाता है कि सामाजिक न्याय सरकार की प्राथमिकता में नहीं है।
एमएसएमई और निर्यात पर भी सरकार विफल
एमएसएमई और निर्यात को बढ़ावा देने के दावों पर सवाल उठाते हुए ओला ने कहा कि
वैश्विक प्रतिस्पर्धा के इस दौर में छोटे और मध्यम उद्योगों को मजबूती देने में सरकार पूरी तरह विफल रही है।
जनविरोधी बजट की कड़ी निंदा
सांसद बृजेंद्र सिंह ओला ने कहा
कुल मिलाकर यह बजट किसान-विरोधी, युवा-विरोधी, महिला-विरोधी और SC-ST-OBC विरोधी है।
‘सबका साथ, सबका विकास’ का नारा अब केवल एक राजनीतिक जुमला बनकर रह गया है।
