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होली आई पर अब कहां चंग के कद्रदान

मण्डावा में चंग तैयार करते कारीगर मण्डावा [ सूर्यप्रकाश लाहोरा ] एक जमाना था जब मण्डावा के मोहल्ला खटीकान व आस -पास क्षैत्रों में फागुन में बजाए जाने वाले चंग का निर्माण घर घर हुआ करता था । यह वह समय था जब चंग खरीदने वालो के साथ इन्हे बनाने वालो में खासा उत्साह था लेकिन अब तेजी से होते सामाजिक परिवर्तन , लोक संस्कृति के प्रति बढ़ती अरूचि तथा मंहगाई बढ़ने के कारण अब इस व्यवसाय पर संकट मडराने लगा है । दो दशक पूर्व तक इस निर्माण में लगभग दर्जनभर परिवार लगे थे जिसकी संख्या घटकर अब एक -दो के आस -पास रह गई हैं । शेष परिवार भी बढ़ती मंहगाई के कारण अन्य धन्धो को अपना रहे है। इस व्यवसाय में लगे महावीर प्रसाद खटीक व रमेश कुमार का मानना है कि एक बड़ा चंग [ ढ़प्प ] तैयार करने में पांच – छह सौ रूपए का खर्च आता है यह बिकता भी उतने में ही है यानि बड़ा चंग नौ सो तथा छोटा चंग सात सौ -आठ सौ रूपए में, इसके अलावा चंग तैयार करने की पूरी प्रकिया में कई दिन की मेहनत लगती है । महावीर प्रसाद खटीक ने बताया कि चार दशक पहले एक चंग ढाई -तीन रूपए में बिकता था तब लागत कम थी अौर मुनाफा भी होता था लेकिन अब ऐसा नहीं है । इसके अलावा चंग निर्माण की प्रक्रिया अत्यधिक जटिल है । चंग निर्माण के लिए ग्रामीण क्षैत्रो में खाल खरीदनी पड़ती है एक तीन सौ से चार सौ रूपए में मिलती है । इसमें बकरे व भेड.की खाल की कीमत अलग -अलग होती है लेकिन भेङ की खाल यह श्रेष्ठ मानी जाती है । बकरे की खाल की तुलना में भेड की खाल से बना चंग न केवल मजबूत होता है बल्कि आवाज भी उसकी अच्छी होती है i चंग तैयार करने के लिए बकरे व भेड के पशुओं की खाल को 25 से 30 दिन तक पानी में भिगौकर रखना पड़ता है । इसके बाद उसके बाद बाल हटाए जाते है। साथ ही एक विशेष मसाला भी तैयार करना पड़ता है । इसमें चावल का माड, आकटा का दूध व धमासिया [ एक प्रकार की जड़ी बुंडी ] को मिलाकर मसाला तैयार किया जाता है । आक का दूध एकत्रित करने के लिए गावों तथा आस -पास के क्षेत्रो में जाना पड़ता हेै । इसे बोतल में संग्रहीत किया जाता है । खाल को धोने के बाद इस पर मसाला लगाया जाता है । इसके बाद खाल को लकड़ी के घेरे पर लगाते है । चार -पांच दिन में सूखने के बाद चंग तैयार हो जाता है । एक पशु की खाल से एक बड़ा चंग ही तैयार हो पाता है । इसी व्यवसाय से जुड़े रमेशकुमार खटीक बताते है कि पूरी प्रकिया में मेहनत अधिक है और मुनाफा कम है । नई पीढ़ी इस धन्धे को छोड़कर अन्य धन्धो से जुड़ रही है । इसके अलावा पिछले कुछ वर्षो से चंग बजाने वालो की संख्या में गिरावट आ रही है । होली के दिनों में पहले अमूमन हर मोहल्ले व चौक में चंग बजा करते थे लोगो में उत्साह भी था लेकिन अब यह बात नहीं है। बाहरी परकोटे में चंग बजाना कुछ लोगो तक ही सीमित होकर रह गया है । पूर्व में होली के दिनों में एक ही दिन में दस से बारह चंग बिक जाया करते थे वहीं अब चार -पांच चंग भी मुश्किल से बिकते है । दो -तीन सालों से प्लास्टिक की शीट के भी चंग तैयार होने लगे है । इनकी कीमत भी उतनी ही है । लेकिन लोग आज भी भेड़ की खाल से बने चंग को ही प्राथमिकता देते है ।

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