बीमा कंपनी की टालमटोल पर आयोग सख्त, उपभोक्ता को मिलेगा पूरा मुआवजा
झुंझुनूं जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने उपभोक्ता हित में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए एक बीमा कंपनी को वाहन दुर्घटना क्लेम की राशि का भुगतान करने का आदेश दिया है।
आयोग ने कहा कि बीमा कंपनी प्रीमियम लेने के बाद क्लेम भुगतान से बच नहीं सकती।
आयोग की सख्त टिप्पणी
आयोग के अध्यक्ष मनोज कुमार मील और सदस्य प्रमेन्द्र कुमार सैनी की पीठ ने यह फैसला सुनाया।
सुनवाई के दौरान आयोग ने टिप्पणी की कि बीमा कंपनियों को केवल अपने मुनाफे की चिंता नहीं करनी चाहिए, बल्कि बीमा धारकों के साथ निष्पक्ष और पारदर्शी व्यवहार करना चाहिए।
कार दुर्घटना में जल गई थी गाड़ी
परिवादी कुलदीप भास्कर निवासी झुंझुनूं ने आयोग में परिवाद दायर किया था।
उन्होंने बताया कि उनकी कार का बीमा 9 लाख 50 हजार रुपये के बीमित मूल्य पर कराया गया था।
13 दिसंबर 2021 को उनकी कार दुर्घटनाग्रस्त होकर आग लगने से पूरी तरह जल गई। इसके बाद बीमा कंपनी के पास क्लेम प्रस्तुत किया गया, लेकिन लंबे समय तक दावा निपटान नहीं किया गया।
सर्वेयर रिपोर्ट में टोटल लॉस
मामले की सुनवाई के दौरान आयोग के सामने प्रस्तुत सर्वेयर रिपोर्ट में वाहन को टोटल लॉस मानते हुए लगभग 9 लाख 48 हजार रुपये की क्षति आंकी गई।
इसके बावजूद बीमा कंपनी द्वारा भुगतान नहीं किया गया, जिसे आयोग ने सेवा में कमी और अनुचित व्यापार व्यवहार माना।
45 दिन में भुगतान का आदेश
आयोग ने अपने आदेश में कहा कि बीमा कंपनी को:
- 9 लाख 48 हजार रुपये क्लेम राशि
- 6 जनवरी 2023 से भुगतान तक 9% वार्षिक ब्याज
- 1 लाख 35 हजार रुपये मानसिक पीड़ा के लिए
- 5 हजार रुपये परिवाद व्यय
45 दिनों के भीतर भुगतान करना होगा।
देरी पर 12.5% ब्याज लगेगा
आयोग ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि निर्धारित समय में भुगतान नहीं किया गया तो पूरी राशि पर 12.5 प्रतिशत वार्षिक ब्याज लागू होगा।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी हवाला
आयोग ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि बीमा कंपनियों से उम्मीद की जाती है कि वे बीमा धारकों के साथ वास्तविक और निष्पक्ष व्यवहार करें।
बीमा कंपनियों की जिम्मेदारी ज्यादा
आयोग ने अपने आदेश में यह भी कहा कि अक्सर देखा जाता है कि बीमा पॉलिसी जारी करते समय कंपनियां प्रीमियम तो ले लेती हैं, लेकिन जब क्षतिपूर्ति का समय आता है तो पॉलिसी की शर्तों की आड़ में भुगतान से बचने की कोशिश करती हैं।
आयोग ने स्पष्ट किया कि सद्भावना का दायित्व उपभोक्ता से ज्यादा बीमा कंपनी पर होता है, क्योंकि पॉलिसी जारी करने का अधिकार कंपनी के पास होता है।
