Hindi News / Jhunjhunu News (झुंझुनू समाचार) / जैविक वायरस बनाम सामाजिक वायरस

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जैविक वायरस बनाम सामाजिक वायरस

लेखक – राजकुमार प्रधानाचार्य, राउमावि धनूरी, झुझुनूं

झुझुनूं, प्राणी मात्र में एक मानव ही तो है जिसे पूर्णरूपेण सामाजिक प्राणी कहा जा सकता है । आदिकाल के कटु अनुभवों ने मनुष्य प्रजाती को अपनी तत्कालिक आवयश्कताओं को पूरा करने हेतु आपसी समझौते के तहत एक बंधन में बंधने हेतु प्रेरित किया जिसके परिणामस्वरूप परिवार, समुदाय व समाज जैसी संस्था का पादुर्भाव हुआ । मानव प्राणी मात्र की कठोर तपस्या लम्बे अनुभव सयोजन में निर्मित ये सुन्दर संस्था ”समाज’’ आज छिन-भिन्न होती नजर आ रही है, मनुष्य आज अपने अस्तित्व को बचानें हेतु संघर्ष करता नजर आ रहा है। हर कोई सशंकित है, चारो ओर भय और नैराश्य का वातावरण विद्यमान है, पूरे विश्व में हा-हा-कार मची हुई है कारण है ”जैविक वायरस’’ ।
क्या ये वायरस प्रकृति का प्रकोप है ? या इसके पीछे अन्य कारक भी जिम्मेदार है ? जी हां । गहराई से पङताल करे तो सामने आता है कि जैविक वायरस जनक उससे भी बङा और भयानक है जिसका नाम है। ”सामाजिक वायरस’’। जैविक वायरस के मूल में ये सामाजिक वायरस ही तो है जिसने जैविक वायरस को मरने नही दिया और दिनों दिन फलीभूत किया तथा मानव अस्तित्व को बारूद के ढेर पर लाकर खङा कर दिया ।
आओ जानने का प्रयास करते है क्या है ? ”सामाजिक वायरस’’ और कौनसे वो कारक है जिन्होने इसे इतना विनाशकारी रूप दे दिया –

  1. सामाजिक मूल्य (प्रेम, भाईचारा, सहयोग, सहिष्णुता, सच्चाई, ईमानदारी) का पतन ।
  2. आर्थिक प्रतिद्वन्द्वता व भौतिकवाद की होङ ।
  3. अति महत्वाकांक्षा ।
  4. विलाषीतापूर्ण जीवन ।
  5. विश्वव्यापी कानून एवं शिक्षा व्यवस्था का अभाव ।
  6. मानव का बौद्धिक अपहरण । ये वो बिन्दु है जिनसे कोरोना जैसे जैविक वायरस के ताण्डव के मूल को समझा जा सकता है। प्रतिदिन समाचार पत्रों, न्यूज चैनलों व सोशल मीडिया के माध्यम से सुना और पढा जा रहा है कि हर देश किसी देश विशेष (समाज) को जिम्मेदार ठहरानें में लगा है, आरोप-प्रत्यारोप जङे जा रहे है क्योंकि अब हमारी जान की बाजी लगनें को आतुर है परन्तु अब क्या फायदा ? क्यों किया सामाजिक मूल्यों का पतन ? क्यों लगे थे भौतिक चकाचैध की वृद्धि में ? क्यों नही दिये वो संस्कार जो प्रेम, भाईचारा, सहिष्णुता, सहयोग और प्राणीमात्र सेवा से अभिभूत थे । इन मूल्यों का अभाव ही है जो आज मानव-मानव की जान लेता जा रहा है यदि मूल्य जिंदा होते तो न चमगादङ खाया जाता, न लेबोट्री में बेतुका परीक्षण होता, न प्रयोगशाला में लापरवाही होती, न दूसरे देशो को नकली रैपिड किट भेजे जाते, न यात्री हवाई जहाज दूसरे देशो में उङाये जाते, न ही ॅभ्व् महामारी से अनभिज्ञ रहता और न कभी हमारे कर्मवीर योद्धा (डाॅक्टर, पुलिसकर्मी आदि) पिटते । ये सब न होता तो हम सब एकजूट होकर समाज के किसी क्षेत्र विशेष मे आई प्राकृतिक महामारी पर बङी आसानी से मानव जाति की फतेह करवाते ।
    पर नही मुझे ये मंजूर नही था, मैं क्यों मानु ? मै तो सर्वोपरी हूॅ जिस प्रकार जगल में राजा एक ही होता है ।
    एक म्यान में एक ही तलवार रहती है वैसे ही मानव राजा तो मैं ही हूॅ बाकी मानव प्रजाति तो मेरी दास है, मुझे विलाषीता में जीना है, ये मेरी अति महत्वांकाक्षा ही तो है जो मुझे आर्थिक और भौतिक समृद्धि देती है । मेरे लिए कानून नही, मै तो स्वयं कानून हैू इसी लिये तो आज मेरी प्रजा (अनुयायी) प्रजा न होकर ”सामाजिक वायरस’’ बन चुकी है जो किसी भी जैविक वायरस से कई गुणा विनाषकारी है । मुझसे मानव समाज को बचाना है तो शिक्षा स्वरूप को बदलना होगा, विश्वव्यापी अभियान चालाना होगा, मूल्यों और संस्कारों को स्थान देना होगा ।
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