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जयंती विशेष : शहीदे आजम भगत सिंह के आदर्श थे क्रांतिकारी शहीद करतार सिंह सराभा

“शहर के अंधेरे को इक चराग़ काफ़ी है,
सौ चराग़ जलते हैं इक चराग़ जलने से”

लेखक – धर्मपाल गाँधी, अध्यक्ष आदर्श समाज समिति इंडिया

करतार सिंह सराभा देश की आजादी के लिए मात्र 19 वर्ष की अल्पायु में फाँसी पर चढ़ने वाले भारत के प्रसिद्ध क्रांतिकारी थे। वे शहीदे आजम सरदार भगत सिंह के आदर्श थे। उनके शौर्य एवं बलिदान की मार्मिक गाथा आज भी भारतीयों को प्रेरणा देती है। आजादी की लड़ाई में 18 वर्ष की अल्पायु में शहीद हुए बंगाल के क्रांतिकारी खुदीराम बोस के बाद शहीद करतार सिंह सराभा का नाम आता है, जिन्होंने रहम की अपील ठुकरा कर 19 वर्ष की अल्पायु में फाँसी का फंदा चूमा था। उन्होंने कहा कि था कि अगर हजार जिंदगियां भी मिले तो उसे देश के लिए हँसते-हँसते कुर्बान कर दूँ। 24 मई 1896 को लुधियाना के गाँव ‘सराभा’ के धनवान किसान मंगल सिंह और माँ साहिब कौर के घर जन्मे करतार सिंह सराभा को अंग्रेजों ने 16 नवंबर 1915 को लाहौर की सेंट्रल जेल में फाँसी पर लटका दिया था। महान क्रांतिकारी सरदार भगत सिंह उनसे बहुत प्रभावित थे। जब भगत सिंह को ब्रिटिश पुलिस ने ब्रिटिश सरकार विरोधी गतिविधियों में शामिल होने के आरोप में गिरफ्तार किया था तो उन्होंने उनकी जेब से करतार सिंह सराभा की एक तस्वीर बरामद की थी। भगत सिंह की माँ ने एक मीडिया हाउस से बातचीत के दौरान कहा कि भगत सिंह उनसे कहा करते थे कि करतार सिंह सराभा उनके हीरो हैं। उन्होंने कहा- भगत सिंह की गिरफ्तारी पर उसके पास से सराभा की एक फोटो बरामद हुई थी। वह हमेशा इस फोटो को अपनी जेब में रखते थे। बहुत बार भगत सिंह मुझे वह तस्वीर दिखाते और कहते, ‘प्रिय माँ, यह मेरा नायक, मित्र और मेरा आदर्श है।”
आज़ादी के आन्दोलन में कई युवा क्रांतिकारी हुए हैं, जिनका जीवन काफी छोटा रहा, लेकिन इस छोटे से जीवन में उन्होंने बहुत बड़े काम किये। करतार सिंह सराभा ने स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करते हुए जो उदाहरण पेश किये, वे उनके जीवन काल को बड़ा और उनके व्यक्तित्व को महान बनाते हैं। करतार सिंह सराभा ग़दर आंदोलन के जीवंत कड़ी थे और युवा क्रांतिकारियों के लिए प्रेरणा के प्रकाश-पुंज…
‘शहर के अंधेरे को इक चराग़ काफ़ी है,
सौ चराग़ जलते हैं इक चराग़ जलने से’
करतार सिंह सराभा का जन्म पंजाब के लुधियाना ज़िले के ‘सराभा’ नामक ग्राम में 24 मई 1896 को हुआ था। उनकी माता का नाम साहिब कौर और पिता का नाम मंगल सिंह था, जिनके दो भाई थे- उनमें से एक उत्तर प्रदेश में इंस्पेक्टर के पद पर प्रतिष्ठित था तथा दूसरा भाई उड़ीसा में वन विभाग के अधिकारी के पद पर कार्यरत था। सराभा की एक छोटी बहन भी थी, जिसका नाम धन्न कौर था। उस समय उड़ीसा, बंगाल राज्य के अंतर्गत आता था। बाल्यावस्था में ही सराभा के पिता का स्वर्गवास हो गया था। उनके दादा बदन सिंह ने उनका तथा छोटी बहन का लालन-पालन किया था। सराभा ने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा लुधियाना में ही प्राप्त की थी। नौवीं कक्षा पास करने के पश्चात् वे अपने चाचा के पास उड़ीसा चले गये और वहीं से हाई स्कूल की परीक्षा पास की।
1905 ई. के ‘बंगाल विभाजन’ के विरुद्ध क्रांतिकारी आन्दोलन प्रारम्भ हो चुका था, जिससे प्रभावित होकर करतार सिंह सराभा क्रांतिकारियों में सम्मिलित हो गये। यद्यपि उन्हें बन्दी नहीं बनाया गया, तथापि क्रांतिकारी विचार की जड़ें उनके हृदय में गहराई तक पहुँच चुकी थीं। 1911 ई. में सराभा अपने कुछ सम्बन्धियों के साथ अमेरिका चले गये। वे 1912 में सेन फ़्राँसिस्को पहुँचे। वहाँ पर एक अमेरिकन अधिकारी ने उनसे पूछा “तुम यहाँ क्यों आये हो?” सराभा ने उत्तर देते हुए कहा, “मैं उच्च शिक्षा प्राप्त करने के उद्देश्य से आया हूँ।” किन्तु सराभा उच्च शिक्षा प्राप्त नहीं कर सके। वे हवाई जहाज बनाना एवं चलाना सीखना चाहते थे। अत: इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु एक कारखाने में भर्ती हो गये। उसी समय उनका सम्पर्क लाला हरदयाल से हुआ, जो अमेरिका में रहते हुए भी भारत की स्वतंत्रता के लिए प्रयत्नशील दिखे। उन्होंने सेन फ़्राँसिस्को में रहकर कई स्थानों का दौरा किया और भाषण दिये। सराभा हमेशा उनके साथ रहते थे और प्रत्येक कार्य में उन्हें सहयोग देते थे।
करतार सिंह सराभा साहस की प्रतिमूर्ति थे। देश की आज़ादी से सम्बन्धित किसी भी कार्य में वे हमेशा आगे रहते थे। 25 मार्च 1913 में ओरेगन प्रान्त में भारतीयों की एक बहुत बड़ी सभा हुई, जिसके मुख्य वक्ता लाला हरदयाल थे। उन्होंने सभा में भाषण देते हुए कहा था, “मुझे ऐसे युवकों की आवश्यकता है, जो भारत की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राण दे सकें।” इस पर सर्वप्रथम करतार सिंह सराभा ने उठकर अपने आपको प्रस्तुत किया। तालियों की गड़गड़ाहट के बीच लाला हरदयाल ने सराभा को अपने गले से लगा लिया। इसी सभा में ‘गदर’ नाम से एक समाचार पत्र निकालने का निश्चय किया गया, जो भारत की स्वतंत्रता का प्रचार करे। इसे कई भाषाओं में प्रकाशित किया जाये और जिन-जिन देशों में भारतवासी रहते हैं, उन सभी में इसे भेजा जाये। फलत: 1913 ई. में ‘गदर’ समाचार पत्र प्रकाशित हुआ। इसके पंजाबी संस्करण के सम्पादक का कार्य करतार सिंह सराभा ही करते थे। 1914 में जब ‘प्रथम विश्व युद्ध’ प्रारम्भ हुआ तो अंग्रेज़ युद्ध में बुरी तरह फँस गये। ऐसी स्थिति में ‘ग़दर पार्टी’ के कार्यकर्ताओं ने सोचा और योजना बनाई कि यदि इस समय भारत में विद्रोह हो जाये तो भारत को आज़ादी मिल सकती है। अत: अमेरिका में रहने वाले चार हज़ार भारतीय इसके लिए तैयार हो गये। उन्होंने अपना सब कुछ बेचकर गोला-बारूद और पिस्तोलें ख़रीदीं और जहाज में बैठकर भारत के लिए रवाना हो गये। उन लोगों में से एक सराभा भी थे। लेकिन कार्य पूर्ण होने से पूर्व ही भेद खुल जाने के कारण बहुत से लोगों को गोला-बारूद सहित मार्ग में एवं कुछ को भारत के समुद्री तट के किनारे पर पहुँचने से पूर्व ही बन्दी बना लिया गया। सराभा अपने साथियों के साथ किसी प्रकार से बच निकलने में सफल रहे। अब पंजाब पहुँचकर उन्होंने गुप्त रूप से विद्रोह के लिए तैयारियाँ आरम्भ कर दीं। सराभा ने गुप्त रूप से क्रांतिकारियों से मिलने का निश्चय किया, ताकि भारत में विप्लव की आग जलाई जा सके। इसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु उन्होंने सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, रासबिहारी बोस, शचीन्द्रनाथ सान्याल आदि क्रांतिकारियों से भेंट की। उनके प्रयत्नों से जालंधर की एक बगीची में एक गोष्ठी आयोजित की गई, जिसमें पंजाब के सभी क्रांतिकारियों ने भाग लिया। इस समय सराभा की आयु मात्र 19 वर्ष की थी। इस गोष्ठी में पंजाब के क्रांतिकारियों ने यह सुझाव दिया कि रासबिहारी बोस को पंजाब में आकर क्रांतिकारियों का संगठन बनाना चाहिए। फलत: रासबिहारी बोस ने पंजाब आकर सैनिकों का संगठन बनाया। इसी समय उन्होंने विद्रोह के लिए एक योजना भी बनाई। इस योजना के अनुसार समस्त भारत में फौजी छावनियाँ एक ही दिन और एक ही समय में अंग्रेज़ सरकार के विरुद्ध विद्रोह करेंगी। सराभा ने लाहौर, फ़िरोजपुर, लायलपुर एवं अमृतसर आदि छावनियों में घूम-घूमकर पंजाबी सैनिकों को संगठित करके उन्हें विप्लव करने हेतु प्रेरित किया। वस्तुत: सराभा ने पंजाब की समस्त फौजी छावनियों में विप्लव की अग्नि प्रज्ज्वलित कर दी थी।
रासबिहारी बोस छद्म वेश में लाहौर में एक मकान में रहते थे। सराभा उनके पास मिलने के लिए आते-जाते रहते थे। योजना के अनुसार 21 फ़रवरी 1915 का दिन समस्त भारत में क्रांति के लिए निश्चित किया गया था। पर 15 फ़रवरी को ही भेद खुल गया। हुआ यह कि एक गुप्तचर क्रांतिकारी दल में सम्मिलित हो गया था। उसे जब 21 फ़रवरी को समस्त भारत में क्रांति होने के बारे में जानकारी मिली, तो उसने 16 फ़रवरी को उस भेद को ब्रिटिश सरकार के समक्ष प्रकट कर दिया। फलत: चारों ओर जोरों से गिरफ्तारियाँ होने लगीं। बंगाल तथा पंजाब में तो गिरफ्तारियों का तांता लग गया। रासबिहारी बोस किसी प्रकार लाहौर से वाराणसी होते हुए कलकत्ता चले गये और वहाँ से छद्म नाम से पासपोर्ट बनवाकर जापान चले गये। रासबिहारी बोस ने लाहौर छोड़ने से पूर्व सराभा को क़ाबुल चले जाने का परामर्श दिया था। अत: उन्होंने क़ाबुल के लिए प्रस्थान कर दिया। जब वे वजीराबाद पहुँचे, तो उनके मन में यह विचार आया कि इस तरह छिपकर भागने से अच्छा है कि वे देश के लिए फाँसी के फंदे पर चढ़कर अपने प्राण न्यौछावर कर दें। किसी ने ठीक ही लिखा है-
वीर मृत्यु से कभी न डरते, हँस कर गले लगाते हैं,
फूलों की कोमल शैया समझ, सूली पर सो जाते हैं।
सराभा के मन में ऐसा विचार आते ही वे वजीराबाद की फौजी छावनी में चले गये और वहाँ उन्होंने फौजियों के समक्ष भाषण देते हुए कहा, “भाइयो, अंग्रेज़ विदेशी हैं। हमें उनकी बात नहीं माननी चाहिए। हमें आपस में मिलकर अंग्रेज़ी शासन को समाप्त कर देना चाहिए।” सराभा ने गिरफ्तार होने के लिए ही ऐसा भाषण दिया था। फलत: उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। इस अवसर पर उन्होंने बड़े गर्व के साथ स्वीकार किया कि वे अंग्रेज़ी शासन को समाप्त करने के लिए सैनिक विद्रोह करना चाहते थे।
करतार सिंह सराभा पर हत्या, डाका, शासन को उलटने का अभियोग लगाकर ‘लाहौर षड़यन्त्र’ के नाम से मुकदमा चलाया गया। उनके साथ 63 दूसरे क्रांतिकारियों पर भी मुकदमा चलाया गया था। सराभा ने अदालत में अपने अपराध को स्वीकार करते हुए ये शब्द कहे, “मैं भारत में क्रांति लाने का समर्थक हूँ और इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए अमेरिका से यहाँ आया हूँ। यदि मुझे मृत्युदंड दिया जायेगा, तो मैं अपने आपको सौभाग्यशाली समझूँगा, क्योंकि पुनर्जन्म के सिद्धांत के अनुसार मेरा जन्म फिर से भारत में होगा और मैं मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए काम कर सकूँगा।” जज ने उन 63 व्यक्तियों में से 24 को फाँसी की सज़ा सुनाई। जब इसके विरुद्ध अपील की गई, तो सात व्यक्तियों की फाँसी की सज़ा पूर्ववत् रखी गई थी। उन सात व्यक्तियों के नाम थे- करतार सिंह सराभा, विष्णु पिंगले, काशीराम, जगतसिंह, हरिनाम सिंह, सज्जन सिंह एवं बख्शीश सिंह। फाँसी पर झूलने से पूर्व सराभा ने यह शब्द कहे- हे भगवान मेरी यह प्रार्थना है कि मैं भारत में उस समय तक जन्म लेता रहूँ, जब तक कि मेरा देश स्वतंत्र न हो जाये।
16 नवम्बर 1915 को सरदार करतार सिंह सराभा हँसते-हँसते फाँसी के फंदे पर झूल गये। जज ने उनके मुकदमे का निर्णय सुनाते हुए कहा था, “इस युवक ने अमेरिका से लेकर हिन्दुस्तान तक अंग्रेज़ शासन को उलटने का प्रयास किया। इसे जब और जहाँ भी अवसर मिला, अंग्रेज़ों को हानि पहुँचाने का प्रयत्न किया। इसकी अवस्था बहुत कम है, किन्तु अंग्रेज़ी शासन के लिए बड़ा भयानक है।”
भाई परमानन्द ने सराभा के जेल के जीवन का वर्णन करते हुए लिखा है, “सराभा को कोठरी में भी हथकड़ियों और बेड़ियों से युक्त रखा जाता था। उनसे सिपाही बहुत डरते थे। उन्हें जब बाहर निकाला जाता था, तो सिपाहियों की बड़ी टुकड़ी उनके आगे-पीछे चलती थी। उनके सिर पर मृत्यु सवार थी, किन्तु वे हँसते-मुस्कराते रहते थे।” भाई परमानन्द ने सराभा के सम्बन्ध में आगे और लिखा है, “मैंने सराभा को अमेरिका में देखा था। वे ग़दर पार्टी के कार्यकर्ताओं में मुख्य थे। वे बड़े साहसी और वीर थे। जिस काम को कोई भी नहीं कर सकता था, उसे करने के लिए सराभा हमेशा तैयार रहते थे। उन्हें कांटों की राह पर चलने में सुख मालूम होता था, मृत्यु को गले लगाने में आनन्द प्राप्त होता था।”
सराभा जब अमेरिका से जहाज में बैठकर भारत आ रहे थे, तब रास्ते में ही उनके बहुत से साथी गिरफ्तार कर लिये गये थे, पर वे किसी भी तरह बचकर पंजाब आ गये और कुछ ही समय में अपनी देशभक्ति एवं वीरता के कारण प्रसिद्धि प्राप्त कर ली। उन्होंने पंजाब के क्रांतिकारियों को संगठित किया और चारों ओर घूम-घूमकर फौजियों को विद्रोह करने हेतु प्रेरित किया। यदि भेद न खुलता, तो सारे भारत में एक साथ क्रांति की अग्नि की लपटों में ब्रिटिश शासन जल कर राख हो जाता। करतार सिंह सराभा भी भारत माँ के एक ऐसे लाल थे, जिन्होंने देश की स्वतंत्रता के लिए असंख्य कष्ट सहे और यहाँ तक कि अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया। ऐसे वीर सपूत का नाम भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में हमेशा अमर रहेगा‌। माँ भारती की परतंत्रता की बेड़ियों को तोड़ने के लिए 19 वर्ष की अल्पायु में ही हँसते-हँसते प्राणोत्सर्ग कर देने वाले शहीद करतार सिंह सराभा के साहस, त्याग एवं बलिदान की गाथा युगों-युगों तक हर भारतवासी को प्रेरित करती रहेगी।

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