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Jhunjhunu News : झुंझुनूं में बीमा कंपनी को झटका, 5 लाख का दावा मंजूर

Consumer commission orders insurance company to pay claim

झुंझुनूं, जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग झुंझुनूं ने एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी को मृतक किसान सदस्य की नामित मां को 5 लाख रुपये की बीमा राशि ब्याज सहित भुगतान करने का आदेश दिया है।

आयोग की पीठ में अध्यक्ष मनोज कुमार मील एवं सदस्य प्रमेंद्र कुमार सैनी शामिल थे।

बीमा कंपनी पर 55 हजार रुपये की शास्ति

उपभोक्ता आयोग ने बीमा कंपनी के रवैये को अनुचित कार्य व्यवहार, अनुचित व्यापार प्रथा और सेवा में कमी मानते हुए कंपनी पर 55 हजार रुपये की शास्ति भी लगाई।

यह राशि राजस्थान राज्य उपभोक्ता कल्याण कोष, जयपुर में जमा कराने के निर्देश दिए गए हैं।

क्या था पूरा मामला?

मामले के अनुसार रघुनाथपुरा निवासी अनूप देरवाला ग्राम सेवा सहकारी समिति का सदस्य था और समूह व्यक्तिगत दुर्घटना बीमा योजना के तहत 5 लाख रुपये के लिए बीमित था।

3 अक्टूबर 2016 को पंचायत राज चुनाव से जुड़े पारिवारिक विवाद के दौरान हुए हिंसक झगड़े में उसकी मृत्यु हो गई थी। इसके बाद उसकी मां सुमित्रा देवी बेनीवाल ने बीमा दावा प्रस्तुत किया।

78 दिन की देरी बताकर खारिज किया था दावा

बीमा कंपनी ने दावा खारिज करते हुए कहा कि घटना की सूचना उसे 78 दिन बाद दी गई, जबकि पॉलिसी शर्तों के अनुसार सूचना तत्काल दी जानी चाहिए थी।

कंपनी ने यह तर्क भी दिया कि मृतक घटना में स्वयं शामिल था, इसलिए दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता।

इसके बाद सुमित्रा देवी ने उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया।

आयोग ने माना बीमा कंपनी का रवैया गलत

सुनवाई के दौरान आयोग ने पाया कि मृतक के परिजनों ने घटना के कुछ दिनों के भीतर ही संबंधित बैंक और सहकारी समिति को सूचना दे दी थी।

यदि सूचना या दावा प्रपत्र बीमा कंपनी तक विलंब से पहुंचा तो इसके लिए परिवादी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

आयोग ने स्पष्ट कहा कि:

“केवल 78 दिन की देरी को आधार बनाकर बीमा दावा खारिज करना न्यायसंगत नहीं है, विशेषकर जब मृत्यु का तथ्य पुलिस जांच, पोस्टमार्टम रिपोर्ट और अन्य अभिलेखों से स्थापित हो चुका हो।”

एमओयू में हत्या की स्थिति में भी बीमा लाभ का प्रावधान

निर्णय में आयोग ने उल्लेख किया कि बीमा कंपनी और राजस्थान स्टेट को-ऑपरेटिव बैंक के बीच हुए एमओयू में हत्या जैसी परिस्थितियों में भी बीमित सदस्य के उत्तराधिकारियों को बीमा राशि देय है।

इसके बावजूद कंपनी द्वारा दावा अस्वीकार करना उपभोक्ता संरक्षण कानून की भावना के विपरीत माना गया।

ब्याज, मुआवजा और वाद व्यय भी देना होगा

आयोग के आदेशानुसार बीमा कंपनी को:

  • 5 लाख रुपये की बीमा राशि
  • परिवाद दायर करने की तिथि से भुगतान तक 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज
  • मानसिक संताप के लिए 45 हजार रुपये
  • वाद व्यय के रूप में 5,500 रुपये

का भुगतान करना होगा।

यदि निर्धारित समय में आदेश की पालना नहीं की गई तो देय राशि पर 12.5 प्रतिशत वार्षिक ब्याज लागू होगा।

उपभोक्ताओं के लिए महत्वपूर्ण संदेश

इस फैसले को उपभोक्ता अधिकारों की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

आयोग ने स्पष्ट संदेश दिया है कि बीमा कंपनियां केवल तकनीकी या प्रक्रियात्मक आधारों पर वैध दावों को अस्वीकार नहीं कर सकतीं। बीमाधारकों और उनके परिवारों के अधिकारों की रक्षा करना कंपनियों की जिम्मेदारी है और नियमों की अनदेखी करने पर उन्हें जवाबदेह ठहराया जा सकता है।

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