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मिथ्या साक्ष्य देने के मामले में दस दिवस का कारावास,दस हजार का जुर्माना

विशेष न्यायाधीश सुकेश कमार जैन द्वारा

झुंझुनूं, लैंगिक अपराधो से बालको का संरक्षण व बालक अधिकर संरक्षण आयोग अधिनियम के विशेष न्यायाधीश सुकेश कमार जैन द्वारा गुरूवार को दिये एक निर्णय में न्यायालय में सशपथ मिथ्या साक्ष्य देने के मामले में महेश पुत्र मुखराम सुनार निवासी कारी हाल निवासी सुनार मोहल्ला कस्बा सिंघाना को 10 दिवस का साधारण कारावास तथा 10 हजार रूपये प्रतिकर के रूप में राजकोष में जमा कराने के आदेश दिये है। मामले के अनुसार महेश सोनी ने एक रिपोर्ट दर्ज करायी थी कि उसकी नाबालिग पुत्री को मुकेश 25 अगस्त 2017 को बहला-फुसलाकर ले गया। पुलिस थाना सिंघाना ने मुकेश कुमार उर्फ रिकूं के विरूद्ध बाद जांच न्यायालय में चालान पेश कर दिया तथा 8 गवाहान के बयान न्यायालय में हुये जिसमें परिवादी महेश की पुत्री पक्षद्रोही घोषित हो गयी तथा नाबालिग पुत्री के पिता महेश भी न्यायालय में पक्षद्रोही घोषित होते हुये कथन किया कि अपनी लडक़ी का वह रिश्ता कर रहा था किन्तु वह शादी नहीं करना चाहती थी, इसलिये नाराज होकर छोटे भाई के पास ग्राम कारी चली गयी व आरोपी के विरूद्ध मुकदमा दर्ज करवा दिया। उसकी लडक़ी को कोई बहला-फुसलाकर नहीं ले गया और ना ही उसके साथ किसी ने कोई गलत काम किया। गवाह ने अपनी पुत्री की उम्र भी 21-22 वर्ष बतायी। इस साक्ष्य के आधार पर न्यायालय द्वारा 4 नवम्बर 2019 को मुकेश उर्फ रिकूं को दोषमुक्त कर दिया तथा उक्त महेश को न्यायालय में सशपथ मिथ्या गवाही देने के सम्बन्ध में नोटिस जारी किया गया जिस पर महेश के न्यायालय में हाजिर होने पर आरोपी महेश को जब परीक्षित किया गया तो उसने अपने बयान मुल्जिम में कथन किया कि मुकेश उर्फ रिकूं उसकी लडक़ी को बहला-फुसलाकर तो ले गया था किन्तु राजीनामा होने के कारण उसे सजा नहीं दिलाना चाहता था तथा आज भी उसके विरूद्ध कोई ग्रिवेंस नही है। विशिष्ट लोक अभियोजक लोकेन्द्र सिंह शेखावत ने न्यायालय में बताया कि पोक्सो अधिनियम के तहत मामलो में अन्वेषण व विचारण के दौरान सरकार की एक बड़ी भारी राशि खर्च होती है। यहां तक की न्यायालय में गवाही के दौरान एक एफएसएल अधिकारी ने प्रकट किया कि एफएसएल, डीएनए रिपोर्ट में एक मामले के परीक्षण की किट ही 20 हजार रूपये की आती है तथा इसमें अन्य व्यय जोड़ दिया जाये तो एक रिपोर्ट तैयार करने में 40 हजार रूपये तक का व्यय हो सकता है। न्यायाधीश ने अपने निर्णय में यह लिखा कि शपथ पर झुठ बोलने की प्रवृति पर अंकुश लगाने को गंभीरता से लिया जाना चाहिये तथा सशपथ झुठे बयान देने की प्रवृति से न्यायालय में मुकदमा दर्ज होकर बेझिझक झुठे साक्ष्ये देने की संख्या अत्यधिक बढ़ती जा रही है तथा इसको नियंत्रण करने के लिये न्यायालय द्वारा ऐसे मामलो में यह समझा गया है कि न्यायिक प्रक्रिया को एक टूल्स के रूप में उपयोग करने को रोका जाये जिसमेें परिवादी पक्ष जब चाहे अपने बयान को बदल देता है। न्यायालय ने अपने निर्णय में यह भी लिखा है कि न्यायालय के ध्यान में यह तथ्य भी आया है कि ऐसे मामलो में सौदेबाजी के रूप में एक बड़ी राशि का आदान-प्रदान होता है और सौदे-बाजी के जरिये भारी राशि ली जाकर अभियोजन के मामले को विफल कर दिया जाता है। ऐसी स्थिति में न्यायालय में शपथ पर झुठ बोलने वाले गवाहो के विरूद्ध यदि कानूनी कार्यवाही नही की जाये तो शपथ पर झुठ बालने के मामलो की संख्या बढ़ सकती है। न्यायाधीश ने यह भी आदेश दिया कि यदि आरोपी महेश द्वारा उक्त प्रतिकर 10 हजार रूपये की राशि जमा नही करायी जाती है तो उसे 30 दिवस का अतिरिक्त साधारण कारावास और भुगतना होगा।

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