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शहीदी दिवस पर क्रांतिकारी भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव का बलिदान दिवस मनाया

स्वतंत्रता सेनानी बसंती देवी, सुभद्रा जोशी व डॉ. राम मनोहर लोहिया की जयंती और स्वतंत्रता सेनानी सुहासिनी गांगुली की पुण्यतिथि मनाई

सूरजगढ़, आदर्श समाज समिति इंडिया के तत्वाधान में गाँधी फार्म हाउस सूरजगढ़ में शहीदी दिवस पर देश की आजादी के लिए हंसते-हंसते फाँसी के फंदे पर चढ़ने वाले क्रांतिकारी शहीद सरदार भगत सिंह, शिवराम हरि राजगुरु और सुखदेव थापर का बलिदान दिवस मनाया। इस मौके पर स्वतंत्रता सेनानी और महान सामाजिक कार्यकर्ता बसंती देवी, प्रथम लोकसभा की सदस्य भारतीय राजनीतिज्ञ, विभाजन के दंगों में शरणार्थियों की मदद करने वाली महान सामाजिक कार्यकर्ता और स्वतंत्रता सेनानी सुभद्रा जोशी व समाजवादी राजनेता, लेखक व विचारक और स्वतंत्रता सेनानी डॉ. राम मनोहर लोहिया की जयंती व देश की आजादी के लिए जीवन समर्पित करने वाली महान स्वतंत्रता सेनानी सुहासिनी गांगुली की पुण्यतिथि मनाई। कार्यक्रम का शुभारंभ सभी स्वतंत्रता सेनानियों के छायाचित्रों पर पुष्प अर्पित करने के साथ हुआ। ‘चटगाँव आर्मरी रेड’ के नायक महान क्रांतिकारी शहीद सूर्य सेन को भी उनकी जयंती पर याद किया। मास्टर सूर्य सेन का जन्म 22 मार्च 1894 को हुआ था। क्रांतिकारी सूर्य सेन भी भारत की आजादी के लिए जेल में हृदय विदारक अमानवीय यातनाएं सहते हुए 12 जनवरी 1934 को चटगाँव सेंट्रल जेल में फाँसी के फंदे पर झूले थे। आदर्श समाज समिति इंडिया के अध्यक्ष धर्मपाल गाँधी ने 23 मार्च 1931 को लाहौर सेंट्रल जेल में शहीद हुए क्रांतिवीरों के जीवन पर प्रकाश डालते हुए कहा- यह इत्तेफाक की बात है कि सरदार भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के बलिदान दिवस के साथ ही स्वतंत्रता सेनानी बसंती देवी की जयंती है। बसंती देवी स्वतंत्रता सेनानी देशबंधु चितरंजन दास की पत्नी थी। बसंती देवी ने ही 1928 में भारत के नौजवानों से लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने का आह्वान किया था। बसंती देवी के वक्तव्य पर क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद, सरदार भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने उनकी मौत का बदला लेने का निर्णय किया। क्रांतिवीरों ने 17 दिसंबर 1928 को लाहौर में पुलिस अधिकारी जेपी सांडर्स की हत्या कर लाला लाजपत राय की मौत का बदला लिया। चंद्रशेखर आजाद जीते जी कभी पुलिस के हाथ नहीं आये। लेकिन 8 अप्रैल 1929 को दिल्ली असेंबली बम कांड के बाद सरदार भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त को गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद सांडर्स हत्याकांड में शामिल राजगुरु, सुखदेव और अन्य क्रांतिकारियों को भी गिरफ्तार कर लिया गया। इन सभी क्रांतिकारियों पर ‘लाहौर षड्यंत्र केस’ के नाम से मुकदमा चलाया गया। सांडर्स हत्याकांड मामले में सरदार भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फाँसी की सजा दी गई। बटुकेश्वर दत्त को काले पानी की सजा व अन्य क्रांतिकारियों को भी कठोर सजा दी गई। ब्रिटिश हुकूमत द्वारा नियम के विरुद्ध 23 मार्च 1931 को लाहौर सेंट्रल जेल में शाम के समय सरदार भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फाँसी दे दी गई। चंद्रशेखर आजाद अपने साथियों को फाँसी से बचाने की मुहिम में लगे हुए थे। लेकिन भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की फाँसी से कुछ दिन पहले दुर्भाग्यवश 27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में पुलिस मुठभेड़ में वह भी शहीद हो गये। इन क्रांतिवीरों की मौत के साथ ही उत्तर भारत में क्रांतिकारी आंदोलन का अध्याय लगभग समाप्त हो गया। महान क्रांतिवीरों को हम नमन करते हैं। इस मौके पर समाजसेवी इन्द्र सिंह शिल्ला, पूर्व पंचायत समिति सदस्य चाँदकौर, रघुवीर जाखड़, राजेंद्र कुमार गाँधी, सतीश कुमार, सोनू कुमारी, सुनील गाँधी, धर्मपाल गाँधी, पिंकी नारनौलिया, दिनेश, अंजू गाँधी, किरण देवी, बृजेश, हर्ष आदि अन्य लोग मौजूद रहे।

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