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जिस मनुष्य का हृदय उसके वश में नहीं होता तो उसका हृदय ही उसका सबसे बड़ा शत्रु होता है – देवकीनन्दन ठाकुर महाराज

श्री जगदीशप्रसाद झाबरमल टिंबरेवाला विश्वविद्यालय विद्या नगरी में चल रही भागवत कथा

झुंझुनू, श्री जगदीशप्रसाद झाबरमल टिंबरेवाला विश्वविद्यालय विद्या नगरी में चल रही भागवत कथा के दूसरे दिन देवकीनन्दन ठाकुर महाराज ने एक से बढ़कर एक प्रसंग सुनाते हुए विश्वविद्यालय के जेजेटी यूनिवर्सिटी के कुलाधिपति विनोद टीबड़ेवाला , बालकृष्ण टीबड़ेवाला , रमाकांत टीबड़ेवाला , हनुमान प्रसाद बाबूलाल , रजिस्टार डॉ मधु गुप्ता , डॉ अंजू सिंह , पीआरओ राम निवास सोनी , डॉ अमन गुप्ता ने पूज्य महाराज से आशीर्वाद प्राप्त किया। महाराज श्री ने सभी को दुपट्टा पहना कर आशीर्वाद दीया और कहा कि विद्यादान ही ऐसा दान है जिसके बाद मनुष्य अपने पैरों पर खड़ा होता है। अगर आप किसी वस्तु का दान देंगे तो वो वस्तु किसी दिन खत्म हो जाएगी लेकिन विद्या कभी खत्म नहीं होती। इसीलिए हमारे समाज में गुरुओं को, ब्राह्मणों को सर्वश्रेष्ठ माना गया है क्यूंकि वो जो ज्ञान देते हैं वो सदैव हमारे जीवन में काम आता है।

तुमने जीवन में क्या किया, वही किया जो सभी करते हैं खाया, कमाया और सोये। ये काम तो पशु भी करते है, आप में और पशु में ये अंतर है कि आप भगवान का का भजन कर सकते है जबकि पशु भगवान की भक्ति नहीं कर सकते है, परोपकार नहीं कर सकते है। जिस मनुष्य का हृदय उसके वश में नहीं होता तो उसका हृदय ही उसका सबसे बड़ा शत्रु होता है। अमीरों के चेहरों पर कभी मुस्कान नहीं होती और गरीबों के चेहरों पर थकान नहीं होती। अमीरी सब कुछ खरीद सकती है पर चेहरे की मुस्कान नहीं खरीद सकती है। वेद पुराण हमारे जीवन का आधार है यदि इनके साथ आगे बढ़ोगे तो जीवन में कभी दुःख नहीं पाओगे और अगर इसे छोड़ कर आगे बढ़ोगे तो कभी सुखी नहीं रह पाओगे। इस दुनिया में भगवान ने हमें एक उद्देश्य के लिया भेजा है कि जाओ और अपना कल्याण करो क्यूंकि इस दुनिया में म्हणत तो जानवर भी करते है। मनुष्य के कपड़ों से पता नहीं चलता है कि वो धर्मात्मा है या विधर्मी। मनुष्य के आचरण से उसके व्यहार से पता चलता है कि वो वो धर्मात्मा है या विधर्मी। गृहस्थ जीवन भी वहां के दो पहियों की तरह होता है जब तक दोनों साथ है तब तक जीवन की यात्रा सुखमय बीतती है जैसे ही कोई एक पहिया ख़राब हुआ जीवन में दुःख आने शुरू हो जाते हैं। आप जिसके साथ जिस प्रकार का व्यहार करते हैं बदले में आपके साथ भी वैसा ही होता है। यही समय का चक्र है। नालायक संतान से संतान का न होना ज्यादा उचित है। वो संतान जिससे न देश का हित हो, न धर्म का हित हो और न समाज का हित हो ऐसे संतान से न होना ज्यादा अच्छा है।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की श्रीकृष्ण दुखी है की इस कलयुग के व्यक्ति का कल्याण कैसे हो, राधारानी ने पूछा क्या आपने इनके लिए कुछ सोचा है। प्रभु बोले एक उपाय है हमारे वहां से कोई जाए और हमारी कथाओं का गायन कराए और जब ये सुनेंगे तो इनका कल्याण निश्चित हो जाएगा। बात आई की कौन जाएगा, तो बोले की शुक जी जा सकते हैं, शुक को कहा गया वो जाने के लिए तैयार हो गए। श्री शुक भगवान की कथाओंका गायन करने के लिए जा रहे हैं तो मार्ग में कैलाश पर्वत पड़ा, कैलाश में भगवान शिव माता पार्वती के साथ विराजमान हैं।

भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई और वो कथा शुक ने पूरी सुन ली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।

श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए। यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा। श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर जड़भरत संवाद, नृसिंह अवतार, वामन अवतार का वृतांत सुनाया जाएगा। इस अवसर पर मुंबई से आए प्रवासी सहित बड़ी संख्या में गणमान्य लोग मौजूद थे।

जेजेटी में श्रीमद्भागवत कथा के साथ-साथ चल रही जन सेवा के रूप में निशुल्क चिकित्सा शिविर भी लगाए जा रहे हैं जिसमें कथा के दूसरे दिन हृदय रोग विशेषज्ञ डॉक्टर जयपाल बुगालिया ने लगभग 50 लोगों की जांच करें उपचार किया।

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