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तो 2008 को दोहरा सकती है कांग्रेस 

कांग्रेस की गुटबाजी में गहलोत का बढ़ा कद

जी सही सुना है 2008 में भी छः बसपा विधायक थे और सभी ने कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर ली ओर राजस्थान बसपा का विलय कांग्रेस में करा दिया कई साल तक बसपा कोर्ट में चक्कर काटती रही पर कांग्रेस सरकार के पांच साल कुशलतापूर्वक पुरे हो गये। 2008 में राजेंद्र गुढ़ा, राजकुमार शर्मा , मुरारीलाल मीणा , रामकेश मीणा,  रमेश मीणा, गिर्राज सिंह मलिंगा इनको मंत्री पद या मंत्री समकक्ष पद देकर गहलोत ने एडजस्ट किया। जब भी कांग्रेस में आपसी खींचतान थी पूर्ण बहुमत नहीं था।  पर इस मास्टर स्ट्रोक से गहलोत ने पांच साल पुरे किये आज भी स्थिति कमोबेश वही है।  पार्टी में दो गुट हैं। दोनों मुख्यमंत्री की कुर्सी चाहते है।  आपसी सामंजस्य का अभाव है।  तथा पिछले दिनों कई बार ऐसा लगा कि अशोक गहलोत की जादूगरी का असर कम हो रहा है।  पायलेट गुट हावी हैं।  कांग्रेस आलाकमान भी पायलेट को ही आगे बढ़ा रही है। पर एक झटके या यू कहे कि एक ही चाल में गहलोत ने सभी की चित कर दिया और दिखा दिया कि राजनैतिक चातुर्य में वर्तमान में उनके सानी राजस्थान में तो कम से कम कोई दूसरा नहीं है या यो कहे कि अशोक गहलोत का विकल्प राजस्थान में नहीं है। 2008 की परिस्थति अलग थी जब कांग्रेस मजबूत थी कई राज्यों में तथा केंद्र में भी कांग्रेस की सरकार थी पर ऐसी  स्थिति का सामना तो कांग्रेस की कभी नहीं करना पड़ा पार्टी संगठन कार्यकर्ता व नेता हताश हैं। ऐसे दौर का सामना तो पार्टी को एमर्जेन्सी के बाद जनतादल की लहर में भी नहीं करना पड़ा।  कांग्रेस के नेताओ में भाजपा में शामिल होने की होड़ मची है।  आये दिन कोई न कोई नेता कांग्रेस छोड़कर भाजपा ज्वाइन करता है।  ऐसे माहौल में किसी पार्टी का विलय कांग्रेस में करा देना चमत्कार से कम नहीं हैं।  2019 में छः विधायक शामिल हुए है राजेंद्र सिंह गुढ़ा , जोगिन्दर अवाना , वाजिब अली , संदीप यादव, लाखन सिंह, दीपचंद खेरिया हैं।  मंत्री पद का इनाम इन्हे भी मिलना निश्चित है राजेंद्र सिंह गुढ़ा पहले भी मंत्री रहे है इस विलय कार्यक्रम के मुख्य सूत्रधार हैं।  काफी समय से इस क्रियाकलाप के लिए प्रयत्नशील थे तथा अशोक गहलोत के खासे नजदीकी हैं।  चाहे कांग्रेस में रहे या न रहे।  केबिनेट स्तर का मंत्री पद इनके लिए लाजिमी हैं।  झुंझुनू से भी इस सरकार में कोई मंत्री नहीं है इन्हे मंत्री बनाकर अशोक गहलोत ये मांग भी पूरा कर सकते है।  साथ ही साथ जनता में ये मेसेज भी दे सकते है कि राजपूतो  विधानसभा चुनाव में वसुंधरा व भाजपा की खिलाफत की थी तथा भाजपा चाहे हनुमान बेनीवाल हो या नए प्रदेशाध्क्ष सतीश पुनिया हो जाट कार्ड खेलकर राजपूतो की कमी जाटों से पूरा करना चाहती है वर्तमान में राजेंद्र सिंह गुढ़ा की छवि एक बड़े राजपूत नेता तथा एक जाति विशेष को छोड़कर सभी जातियों के नेता की है।  जो बिना राजनैतिक फायदे नुकसान की परवाह किये आम आदमी के साथ हो जाते है।  ऐसे में गहलोत सरकार उन्हें केबिनेट मंत्री भी बना सकती है। 

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