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झुंझुनू जिले की बेलगाम ब्यूरोक्रेसी के दो उदाहरण आए सामने

लोकतंत्र के दो स्तंभों को दी जा रही है खुली चुनौती

एक मामला न्यायपालिका पर दबाव बनाने का प्रयास तो दूसरा लोकतंत्र के चौथे स्तंभ तो आंख दिखाने का असफल प्रयास

झुंझुनू, हाल ही में झुंझुनू जिले से दो ऐसे चौंकाने वाले मामले सामने निकल कर आए हैं जो शासन में बैठे हुए अधिकारियों के अभिमान और हिमाकत की दास्तान बयान करते हैं। एक मामला है स्थाई व अनवरत लोक अदालत जिला एवं सेशन न्यायाधीश झुंझुनू द्वारा नियुक्त न्याय मित्र एवं राजस्थान प्रदेश के पूर्व स्वच्छता ब्रांड अंबेसडर तथा नगर परिषद डूंगरपुर के पूर्व सभापति के के गुप्ता से संबंधित। न्याय मित्र के के गुप्ता को झुंझुनू नगर परिषद नगर पालिका मंडावा और नवलगढ़ के लिए न्याय मित्र नियुक्त किया गया है। न्याय मित्र की के गुप्ता इमानदारी पूर्वक लगातार इनका सघन निरीक्षण करने का कार्य कर रहे हैं और लापरवाह अधिकारियों कर्मचारियों के प्रति कड़े कदम भी उठाए जा रहे हैं। इसी क्रम में उन्होंने नगर पालिका नवलगढ़ के कार्यवाहक अधिशासी अधिकारी द्वारा न्याय मित्र के आदेशों की पालना में घोर लापरवाही बरतने के संबंध में अदालत में दो बार अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की थी। अदालत ने न्याय मित्र की रिपोर्ट पर त्वरित संज्ञान लेते हुए स्वायत शासन विभाग के शासन सचिव को पत्र भेजकर दोषी अधिकारी पर कड़ी कार्रवाई करने और न्याय मित्र के निर्देशों की पालना करने के निर्देश दिए हैं। न्याय मित्र के के गुप्ता का कहना है कि अदालत को भेजी गई रिपोर्ट में नगर पालिका नवलगढ़ के अधिशासी अधिकारी की कार्यशैली को लेकर उनके द्वारा सवाल खड़े किए गए थे कि नगर पालिका अधिशासी अधिकारी अनिल चौधरी कार्यवाहक के तौर पर यह पद संभाल रहे हैं जबकि उनका मूल पदस्थापन चूरू जिले के विद्युत विभाग में सहायक अभियंता पद पर है। न्याय मित्र गुप्ता ने उच्च न्यायालय जोधपुर बेंच के आदेश का हवाला देते हुए बताया कि तकनीकी अधिकारियों को सिर्फ 15 दिन के लिए अधिशासी अधिकारी नगरपालिका का चार्ज दिया जाता है लेकिन अनिल चौधरी नवलगढ़ नगर पालिका अधिशासी अधिकारी का पद लगभग डेढ़ साल से संभाल रहे हैं। गुप्ता ने बताया कि नवलगढ़ नगरपालिका के इन अधिकारी द्वारा लोक अदालत झुंझुनू और माननीय उच्च न्यायालय जोधपुर के आदेशों की भी धज्जियां उड़ाई जा रही हैं और इससे भी बढ़कर न्याय मित्र पर अनुचित दबाव बनाने का प्रयास भी किया जा रहा है।

वही दूसरा मामला लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहे जाने वाले पत्रकार से जुड़ा हुआ है। पत्रकार नीरज सैनी ने अपनी एक आरटीआई के तहत झुंझुनू जिला सूचना जनसंपर्क अधिकारी से मांगी थी लेकिन उन्होंने राजनीतिक पहुंच के अभिमान में सूचना उपलब्ध नहीं करवाई। जिसके चलते परिवादी द्वारा निदेशक सूचना जनसंपर्क विभाग जयपुर को प्रथम अपील प्रस्तुत की गई और इस प्रथम अपील की सुनवाई के दौरान झुंझुनू जिला सूचना जनसंपर्क अधिकारी अनुपस्थित रहे वही परिवादी उपस्थित रहे। जिस पर निदेशक द्वारा जिला सूचना जनसंपर्क अधिकारी को सूचना भेजने के लिए निर्देशित किया गया जिसके उपरांत सूचना परिवादी को उपलब्ध करवाई गई वह भ्रामक और अपूर्ण थी। जिसके चलते पत्रकार नीरज सैनी द्वारा सूचना आयुक्त राजस्थान राज्य सूचना आयोग में द्वितीय अपील दायर की गई है। वही आपकी जानकारी के लिए बता दें कि प्रथम अपील की सुनवाई जो निदेशक सूचना जनसंपर्क विभाग के यहां पर हुई थी उस दिन झुंझुनू पीआरओ उपस्थित नहीं हुए उन्होंने पत्र लिखकर निदेशक को सूचित किया कि झुंझुनूं जिला कलेक्टर ने इस दिन उनकी ड्यूटी किसी अति आवश्यक कार्य में लगाई हुई है। पत्रकार नीरज सैनी ने झुंझुनूं जिला कलेक्टर से दो-तीन बार व्यक्तिगत रूप से भी मिलकर इस संबंध में जानकारी मांगी लेकिन उनको जानकारी उपलब्ध नहीं करवाई गई जिसके चलते उन्होंने झुंझुनू जिला कलेक्टर के यहां पर एक आरटीआई और दाखिल की जिसमें उन्होंने सूचना मांगी की प्रथम अपील की सुनवाई 16 जून वाले दिन आपके यहां से झुंझुनू पीआरओ की ड्यूटी किसी अति आवश्यक कार्य के लिए लगाई गई थी क्या यदि लगाई गई है तो उसका विवरण दिया जाए। वही इस आरटीआई का दूसरा बिंदु था कि झुंझुनू जिला कलेक्ट्रेट के अंदर ऐसे कितने अधिकारी और कर्मचारी कार्यरत हैं जो डेपुटेशन पर हैं उनकी संपूर्ण जानकारी भी दी जाए। बस इतना ही मामला था क्योंकि आरटीआई लगाने वाले पत्रकार और संबंधित अधिकारी एक ही जाति से बिलॉन्ग करते हैं जिसके चलते इन पर हर तरीके से दबाव बनाने के हथकंडे अपनाए गए। सामाजिक ग्रुपों में झुंझुनू जिला कलेक्ट्रेट के यहां पर लगाई गई आरटीआई के आवेदन की मूल कॉपी की फोटो खींच पर भी ग्रुप में डाली गई और गलत कमेंट भी करवाए गये। वही जिला कलेक्ट्रेट से गोपनीय दस्तावेज का बाहर आना और सोशल मीडिया में वायरल होना अपने आप में बहुत बड़ी बात है जो कि एक जांच का विषय है और इसके लिए जिम्मेदार अधिकारी कर्मचारी को सस्पेंड करने की कार्रवाई भी करने की मांग को लेकर पत्रकार ने झुंझुनू जिला कलेक्टर को अपना ज्ञापन सौंप दिया है। वही इसके साथ ही मुख्य न्यायधीश राजस्थान उच्च न्यायालय, मुख्य सचिव राजस्थान सरकार , सूचना आयुक्त राजस्थान सूचना आयोग, मुख्य सूचना आयुक्त केंद्रीय सूचना आयोग, प्रधानमंत्री भारत सरकार और झुंझुनू जिला पुलिस अधीक्षक को भी ज्ञापन की प्रति भेज दी है लेकिन इस दौरान पत्रकार सैनी के ऊपर सोशल मीडिया ग्रुप में आरोप लगाए गए कि किसी दूसरे समाज के बहकावे में आकर वह यह कार्य कर रहे हैं और अप्रत्यक्ष रूप से समझाइश के नाम पर उनको लगातार धमकियां भी दी जा रही हैं। लेकिन झुंझुनू जिला कलेक्टर अभी तक इस पूरे मामले में चुप्पी ही बनाए हुए हैं जो कि अपने आप में बहुत बड़ा सवाल है। इस प्रकार दोनों ही मामले ब्यूरोक्रेसी से जुड़े हुए हैं और इन ब्यूरोक्रेसी से जुड़े हुए अधिकारियों की हिमाकत तो देखें उन्होंने न्यायपालिका के न्याय मित्र पर अनुचित दबाव बनाने का प्रयास किया वहीं दूसरी ओर लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को भी विभिन्न प्रकार से दबाव बनाया जा रहा है मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है और अप्रत्यक्ष रूप से समझाइस के नाम पर विभिन्न प्रकार की धमकियां लगातार दिए जाने का क्रम भी जारी है। जिसके चलते इनके मानसिक स्वास्थ्य पर लगातार चोट की जा रही है।

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