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Video News – राजस्थान का रण जीते तो मोदी सिकंदर, हारे तो जिम्मेदारी लेगा कौन ?

बिना किसी चेहरे के विधानसभा चुनाव के मैदान में उतरेगी भाजपा

झुंझुनू, भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा और गृहमंत्री अमित शाह ने जयपुर में आकर पार्टी की कोर कमेटी की बैठक लेकर जहां अपने ही नेताओं की नब्ज टटोलने का प्रयास किया है वही उन्होंने गुटबाजी को लेकर नाराजगी भी जताई और यह भी साफ हो गया है कि विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री पद के लिए बिना किसी चेहरे के भाजपा मैदान में इस बार उतरने वाली है। यानी कहा जा सकता है कि भाजपा राजस्थान का चुनाव मोदी के चेहरे पर ही लड़ेगी। पार्टी चुनाव जीतती है तो जीत का सेहरा प्रधानमंत्री मोदी के सर पर बंधना तय है लेकिन यदि पार्टी राज्य में चुनाव हारती है तो आखिर मेंहार का ठीकरा किस के सिर पर फोड़ा जायेगा, यह भी सोचने वाली बात है। वही गत दिनों भाजपा ने प्रदेश में अपनी परिवर्तन यात्रा चार दिशाओं में निकाली यह परिवर्तन यात्रा भी बिलकुल वैसी ही दिखाई दी, जैसे चार घोड़े को रस्सी से बांध दिया गया है और उन्हें विपरीत दिशाओं में दौड़ने के लिए फटकार लगाई जाती है। यानी चारों घोड़े यदि बराबर दम लगाते हैं तो घोड़े की स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं होना और यदि कोई सा भी घोड़ा ज्यादा ताकतवर निकलता है तो रस्सी तुड़वाकर एक तरफ निकल जाएगा।

चार दिशाओं में एक साथ भाजपा की जो परिवर्तन यात्रा हुई थी उससे भी यह जाहिर हो गया की पार्टी के अंदर मुख्यमंत्री के पद को लेकर गुटबाजी लगातार बनी हुई है। वही प्रदेश की दो बार मुख्यमंत्री रही वसुंधरा राजे को भी कई बार किनारे करने का प्रयास किया गया लेकिन राजस्थान की दशकों की राजनीति सिर्फ दो ही चेहरों के इर्द-गिर्द घूमती रही है जिसमें एक तो मुख्यमंत्री अशोक गहलोत हैं और दूसरी तरफ भाजपा से वसुंधरा राजे हैं। ऐसी स्थिति में चुनाव से ठीक पहले यकायक वसुंधरा राजे को किनारे करना या साइड लाइन में रखना भाजपा के लिए आसान नहीं होगा। क्योंकि राजस्थान की राजनीति का वसुंधरा राजे को 20 साल का अनुभव हो चुका है और वह प्रदेश की सभी 200 सीटों का रुख भी अच्छे से जानती है। वही आज भी भाजपा के अंदर ऐसा कोई चेहरा नहीं है जिसको लेकर आम जनता में कोई आकर्षण दिखाई पड़े। लेकिन 2018 के चुनाव में बीजेपी की हार के बाद से पार्टी में उनका दरकिनार करने की कोशिश की गई और एक समय ऐसा था जब पार्टी के बैनर और पोस्टरो से वसुंधरा का चेहरा या तस्वीर तक गायब कर दी गई। लेकिन पार्टी को उनका महत्व ज्ञात हुआ और धीरे-धीरे फिर से पार्टी के बैनर और पोस्टरो पर उनका चेहरा नजर आने लगा। इस दौरान वसुंधरा राजे की जितनी भी धार्मिक यात्राएं हुई उनमें भी भारी संख्या में लोगों का हुजूम उमड़ा।

जिसके चलते यह भी महसूस हुआ कि आज भी वसुंधरा इस मरुधरा के लोगों के दिलों पर राज करती है। वसुंधरा राजे की टक्कर में आज भी कोई प्रदेश भाजपा का चेहरा इतनी पहचान नहीं बन पाया कि जो इनको चुनौती दे सके। वसुंधरा राजे की राजनीति करने की जो शैली है वह सीधे ही जाकर लोगों से कनेक्ट हो जाती हैं और किसी भी जाति वर्ग के लोगों से कैसे कनेक्टिविटी बढ़ाई जाती है यह वसुंधरा राजे से सीखा जा सकता है। अमित शाह और राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा जयपुर दौरा करके लौट चुके हैं और यह भी अब तक माना जा रहा है कि पार्टी बिना किसी चेहरे के राजस्थान विधानसभा के चुनाव में उतरने वाली है। लेकिन एक यक्ष प्रश्न यह भी खड़ा होता है की जीत का सेहरा पहने के लिए तो मोदी जी का माथा है लेकिन पार्टी चुनाव हारती है तो आखिर इसकी हार का ठीकरा किसके सर फोड़ा जाएगा।

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