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भीम ने खोदकर निकाली थी बालाजी महाराज की मूर्ति

नौ दशकों से चल रहे 9 दिवसीय अखंड पारायण पाठ

दांतारामगढ़, [लिखा सिंह सैनी ] सीकर व नागौर जिलों की संगम स्थली पर स्थित पंचगिरी दांता की पहचान पहाड़ी पर स्थित दो दुर्गों के अलावा ” ग्राम देवता” के रूप में दक्षिण दिशा में स्थित श्री खेड़ापति बालाजी मंदिर के कारण भी हैं। प्राचीन तीर्थ स्थलों में मां जीण भवानी के मंदिर जीणमाता धाम व कलयुग के अवतारी बाबा श्याम के मंदिर खाटूधाम के मध्य स्थित महाभारत कालीन यह मंदिर जीणमाता व खाटूश्यामजी के मेलों पर आने वाले भक्तों को अपनी ओर आकर्षित करता हैं। यहां पर चैत्र शुक्ला पूर्णिमा के दिन विशाल मेला भरता है जिसमें हाजिरी देने के लिए लोग दूर-दूर से बाबा के दरबार में आकर अपनी मुरादें पूरी करते हैं।नाम की महिमा :-
क्षेत्र के लोगों की रक्षा करने के कारण इन्हें “क्षेत्रपति” यानी खेड़ापति कहा जाता हैं। यह बालाजी का मंदिर “ग्राम देवता” के नाम से प्रसिद्ध हैं। रियासत काल के तत्कालीन शासकों द्वारा भी इस मंदिर को महत्वपूर्ण स्थान प्रदान किया गया था।महाभारत कालीन सबसे पुराना मंदिर :-
हजारों साल पुराना यह मंदिर महाभारत कालीन हैं। इसका उल्लेख “पृथ्वीराज रासो” जैसे प्राचीन ग्रंथ व दांता कस्बे के इतिहास में भी हैं। वनवास काल के दौरान पांडव पांडुपोल अलवर, लोहार्गल, पंचगिरी दांता आदि स्थानों पर आए थे। कहा जाता है कि पांडवों ने अपने वनवास काल में यहां गुरु द्रोणाचार्य के सानिध्य में यज्ञ किया था। उस समय यह मूर्ति जमीन से स्वयं प्रकट हुई थी जिसे भीम ने खोदकर निकाला था। बालाजी महाराज के आदेश से इसे यहां पर ही स्थापित कर दिया गया था। मूर्ति के एक तरफ सूरज और दूसरी तरफ चांद स्थापित हैं। विशाल मुख्य प्रवेश द्वार से बालाजी महाराज की मूर्ति 9 फीट नीचे विराजमान हैं। बालाजी महाराज के सेवक उनको वाल्मीकि रामायण सुनाने वाले पं. हनुमान प्रसाद शास्त्री के अनुसार बालाजी महाराज का यह मंदिर काफी पुराना  हैं। आज भी बालाजी की आरती बोलते समय भीम ने बालाजी की मूर्ति खोदकर निकाली यह बोला जाता है । 
महान विभूतियों की तपोभूमि :-
दांतारामगढ़ क्षेत्र की महान विभूति “परमहंस बाबा परमानंदजी” के भी आराध्य देव श्री खेड़ापति बालाजी ही थे। वे घंटों तक परिक्रमा करते व घंटों तक मूर्ति को निहारते रहते थे एवं मुस्कुराते रहते थे। बाबा परमानंद बालाजी महाराज से साक्षात वार्तालाप करते रहते थे। इस क्षेत्र की दूसरी महान विभूति “बाबा जयपाल गिरी” ने भी कुछ वर्षों तक यहां रहकर तपस्या की थी। बालाजी के पुजारी पं. मोहनलाल दाधीच ने भी कठोर अनुष्ठान व तपोबल के द्वारा कुछ सिद्धियां प्राप्त की थी।
नौ दशकों से चल रहे 9 दिवसीय अखंड पारायण पाठ :-
सन 1930 से लगातार 90 वर्षों से आश्विन व चैत्र नवरात्रों में अखंड पारायण संघ दांता के तत्वावधान में अखंड पारायण के पाठों का संचालन हो रहा हैं। निरंतर व निर्विघ्न लंबे समय से अखंड पारायण के पठन का अपने आप में एक रिकॉर्ड हैं। अखंड पारायण संघ द्वारा संचालित यह पठन लोगों में धर्म व संस्कृति के प्रति आस्था प्रदान करके सद् मार्ग व सदाचार को बढ़ावा देता हैं। वर्तमान स्थिति :-
वर्तमान में मंदिर को आकर्षक रूप प्रदान कर दिया गया हैं। मंदिर में राम दरबार की मनमोहक संगमरमर की मूर्तियों के दर्शन करने से मन नहीं भरता। मंदिर में बड़े शिव मंदिर का भी निर्माण किया गया हैं। वर्तमान में श्री रमाप्रकाश जी दाधीच (पुजारी जी) के अथक प्रयासों से मंदिर निर्माण, धार्मिक प्रवचन व भंडारों के आयोजन हो रहे हैं। श्री बालाजी महाराज के यहां सात अखंड ज्योत चौबीस घंटे  जलती रहती है।

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