सीकर जिले के लक्ष्मणगढ़ के रहने वाले रामगोपाल राकसिया की कहानी संघर्ष और सफलता की मिसाल है।
कम उम्र में ही माता-पिता का साया उठने के बाद उन्होंने जीवन की कठिन राहों का सामना किया।
बचपन में ही टूटा सहारा
रामगोपाल जब करीब 10 वर्ष के थे, तब उनके माता-पिता का निधन हो गया।
इसके बाद उन्होंने सड़कों पर रातें बिताईं और गली-मोहल्लों में रेहड़ी लगाकर जीवन यापन शुरू किया।
रेहड़ी से शुरू हुआ कारोबार
अपने बड़े भाई के साथ मिलकर उन्होंने सब्जी बेचने का काम शुरू किया।
कड़ी मेहनत से कारोबार आगे बढ़ा, लेकिन एक आगजनी की घटना में सारी मेहनत राख हो गई।
संत का आशीर्वाद बना टर्निंग पॉइंट
इस कठिन समय में रतिनाथ महाराज का आशीर्वाद मिला।
बताया जाता है कि उन्होंने कहा था
“अब ठेले नहीं, ट्रकों से सामान आएगा।”
इसके बाद धीरे-धीरे कारोबार फिर पटरी पर आया और फल व्यापार में विस्तार हुआ।
देशभर से आने लगा माल
समय के साथ उनका व्यापार इतना बढ़ा कि आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, दिल्ली और जम्मू-कश्मीर से ट्रकों के जरिए फल आने लगे।
आज सीकर मंडी में उनका बड़ा व्यापार है और वे “रामगोपाल केला गोदाम” के नाम से जाने जाते हैं।
पत्नी का साथ बना ताकत
एक समय ऐसा भी आया जब भारी नुकसान के कारण वे निराश हो गए।
तब उनकी पत्नी भंवरी देवी ने अपने गहने देकर उन्हें फिर से व्यापार शुरू करने के लिए प्रेरित किया।
यहीं से उनका आत्मविश्वास लौटा और उन्होंने फिर सफलता हासिल की।
शिक्षा और समाजसेवा में योगदान
केवल 5वीं तक पढ़े रामगोपाल ने शिक्षा का महत्व समझा और समाजसेवा से जुड़े।
उन्होंने महात्मा ज्योतिबा फुले शिक्षण संस्थान की स्थापना में योगदान दिया।
साथ ही लक्ष्मणगढ़ में छात्रावास निर्माण और अन्य सामाजिक कार्यों में भी सक्रिय भूमिका निभाई।
आज भी सेवा में जुटे
आज उनका कारोबार उनके पुत्र गोविंद संभाल रहे हैं।
रामगोपाल स्वयं समाजसेवा और शिक्षा क्षेत्र में सक्रिय हैं और युवाओं के लिए प्रेरणा बने हुए हैं।



