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सकराय धाम माता शाकंभरी देवी के प्राचीन दो मंदिरों में से पहला शक्तिपीठ

शाकंभरी माता के मंदिर में ब्राह्मणी व रुद्राणी के रूप में हैं दो प्रतिमाएं विराजमान

शाकंभरी सकराय धाम में माता के चमत्कारों को सुनकर दौड़ कर चले आते हैं लाखों श्रद्धालु

उदयपुरवाटी. क्षेत्र के निकटवर्ती सीकर जिले जिले की पहाड़ियों के मध्य सकराय धाम माता शाकम्भरी देवी के मुख्य प्राचीन दो मंदिर है। माता का पहला प्रमुख मंदिर राजस्थान के सकराय गाँव में अरावली की पर्वतमालाओं की शांत मालकेतु घाटी मे स्थित है। यहाँ पर माता के दर्शन ब्रह्माणी और रुद्राणी के रूप मे होते है। माता का यह मंदिर सीकर जिले मे झुंझुनू-नीमकाथाना जिले की सीमा पर स्थित है। उदयपुरवाटी से यह लगभग 15 किमी की दूरी पर स्थित है। कस्बे के शाकम्भरी गेट से 15 किलोमीटर दूर अरावली की पहाडिय़ों के बीच सकरायपीठ माता शाकंभरी का प्राचीन मंदिर स्थित है। मां शाकंभरी के मंदिर की स्थापना सैकड़ों वर्ष पूर्व में हुई थी। माता के मंदिर में ब्रह्माणी व रूद्राणी के रूप में दो प्रतिमाएं विराजमान हैं।सिद्धपीठ होने से माता की ख्याति राजस्थान सहित पूरे भारत में फैली हुई है। मंदिर के पुजारियों के अनुसार माता शाकंभरी के प्राचीन दो मंदिर है। पहला प्राचीन मंदिर यहां सकराय में तो दूसरा उत्तर प्रदेश के सहारनपुर मे है।
माँ का यह पावन धाम अरावली की सुंदर पहाडियों की शांत मालकेतू घाटी में है। प्रतिदिन सुबह साढ़े पांच बजे और शाम को पौने सात बजे माता की आरती होती है। नवरात्र में माता के दरबार में जगह-जगह शतचंडी अनुष्ठानों का आयोजन होता है। माता के दरबार मे अब तक पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा सिंह पाटिल, पूर्व उप राष्ट्रपति भैरूसिंह शेखावत, पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह, सपा के अमरसिंह पहुंच चुके है। इनके अलावा फिल्म स्टार मनोज कुमार, अजय देवगन, काजोल, तनिशा सहित सैंकड़ों अति विशिष्टजन नवरात्र में मां शाकम्भरी के दरबार में दर्शन कर चुके है। क्योंकि माँ की लीला अति विचित्र है। मैय्या के चमत्कारो को सुन हर कोई सकराय दौड़ा आता है। मां शाकंभरी के जाने के लिए एकमात्र मार्ग उदयपुरवाटी से होकर गुजरता है। इसके अलावा जयपुर रोड़ से गौरियां के रास्ते से होते हुए भी मां शाकंभरी के दरबार में श्रद्धालु पहुंचते हैं। लेकिन पहाडिय़ों के मध्य निकले इस रास्ते मे काफी खतरनाक मोड़ है।

कहा जाता है कि यहाँ माँ शाकम्भरी अर्थात ब्रह्माणी को सात्विक और रूद्राणी को तामसिक भोजन परोसा जाता था। भोग के समय देवी की मूर्तियों के बीच पर्दा लगाया जाता था। एक दिन भूलवश माँ ब्रह्माणी अर्थात शाकम्भरी के भोग के थाल से रूद्राणी अर्थात काली का भोग थाल छू गया। तब माँ की मूर्ति का मुख तिरछी ओर हो गया। अतः इस मंदिर से तामसिक भो

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