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शेखावाटी में बेरोजगारी और कौशल विकास केंद्रों की आवश्यकता

Shekhawati youth seeking jobs amid rising unemployment

संपादकीय लेख

राजस्थान का शेखावाटी क्षेत्र अपनी वीरभूमि, शिक्षा परंपरा और उद्यमशीलता के लिए जाना जाता है। सीकर, झुंझुनू और चूरू जैसे जिलों ने देश को सैनिक, शिक्षक, व्यापारी और उद्योगपति दिए हैं। फिर भी विडंबना यह है कि आज इसी क्षेत्र का युवा बेरोजगारी और अवसरों की कमी के कारण बड़े शहरों की ओर पलायन करने को मजबूर है। यह स्थिति केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक चुनौती भी बनती जा रही है।ग्रामीण युवाओं का पलायन मुख्यतः रोजगार के अभाव, सीमित औद्योगिक ढांचे और कौशल आधारित प्रशिक्षण की कमी के कारण हो रहा है। अधिकांश युवा पारंपरिक शिक्षा प्राप्त करते हैं, परंतु रोजगारपरक कौशल से वंचित रह जाते हैं। परिणामस्वरूप वे या तो प्रतियोगी परीक्षाओं की लंबी तैयारी में लग जाते हैं या फिर जयपुर, दिल्ली, अहमदाबाद जैसे शहरों में कम वेतन वाली नौकरियों के लिए पलायन कर जाते हैं।इस पलायन का असर गांवों की सामाजिक संरचना पर भी पड़ता है। कृषि और पारंपरिक व्यवसायों में श्रमबल घटता है, बुजुर्गों पर निर्भरता बढ़ती है और स्थानीय अर्थव्यवस्था कमजोर होती है।

कौशल विकास केंद्र: समय की आवश्यकता

वर्तमान परिस्थिति में शेखावाटी में बड़े पैमाने पर कौशल विकास केंद्रों (Skill Development Centers) की स्थापना अत्यंत आवश्यक है। इन केंद्रों में स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए, जैसेआधुनिक कृषि तकनीक और ड्रिप सिंचाई,डेयरी और पशुपालन प्रबंधन,कंप्यूटर, डिजिटल मार्केटिंग और ई-कॉमर्स,इलेक्ट्रिशियन, प्लंबिंग, मोबाइल रिपेयरिंग, सोलर ऊर्जा तकनीशियन प्रशिक्षण इत्यादि। यदि प्रशिक्षण स्थानीय उद्योगों और बाजार की मांग से जुड़ा होगा तो युवा स्वयं-रोजगार की दिशा में आगे बढ़ सकेंगे।

MSME और स्टार्टअप: नए अवसरों का द्वार

सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग (MSME) शेखावाटी की अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। क्षेत्र में पहले से ही हस्तशिल्प, खाद्य प्रसंस्करण, डेयरी, पत्थर उद्योग और कपड़ा व्यवसाय की संभावनाएँ मौजूद हैं। यदि सरकार और स्थानीय प्रशासन निम्न कदम उठाएँ, तो स्थिति में बड़ा बदलाव संभव है – आसान ऋण और सब्सिडी योजनाएँ,स्थानीय स्तर पर औद्योगिक क्लस्टर की स्थापना,स्टार्टअप इनक्यूबेशन सेंटर,डिजिटल मार्केट से जोड़ने की सुविधा इत्यादि।

आज “लोकल फॉर वोकल” का युग है। यदि शेखावाटी के युवा अपने ही क्षेत्र में बाजरे के उत्पाद, सरसों तेल, ऊन आधारित उत्पाद या पारंपरिक हस्तशिल्प को ब्रांड बनाकर ऑनलाइन बेचें, तो यह न केवल रोजगार सृजित करेगा बल्कि क्षेत्रीय पहचान को भी मजबूत करेगा।एक समय था जब शेखावाटी में छोटे स्तर के तेल मिल, आटा चक्की, ऊन उद्योग और कुटीर उद्योग फलते-फूलते थे। आधुनिक प्रतिस्पर्धा और संसाधनों की कमी के कारण इनमें से कई बंद हो गए। अब आवश्यकता है कि पुरानी औद्योगिक इकाइयों का आधुनिकीकरण किया जाए,युवाओं को उद्योग प्रबंधन और वित्तीय साक्षरता का प्रशिक्षण मिले,निजी क्षेत्र और प्रवासी उद्यमियों को निवेश के लिए प्रेरित किया जाए। शेखावाटी से जुड़े अनेक उद्योगपति देश-विदेश में सफल हैं। यदि वे अपनी जन्मभूमि में निवेश करें तो हजारों युवाओं को स्थानीय स्तर पर रोजगार मिल सकता है। क्षेत्र में शिक्षा का स्तर अपेक्षाकृत अच्छा है, लेकिन शिक्षा और रोजगार के बीच समन्वय की कमी है। कॉलेजों और आईटीआई संस्थानों में उद्योग आधारित पाठ्यक्रम, अप्रेंटिसशिप और इंटर्नशिप कार्यक्रम शुरू किए जाने चाहिए। इससे विद्यार्थी पढ़ाई के दौरान ही व्यावहारिक अनुभव प्राप्त कर सकेंगे।

निष्कर्ष: आत्मनिर्भर शेखावाटी की ओर

बेरोजगारी केवल आंकड़ों का विषय नहीं, बल्कि युवाओं के सपनों और परिवारों की उम्मीदों से जुड़ा प्रश्न है। यदि शेखावाटी में कौशल विकास, MSME प्रोत्साहन और स्थानीय उद्योगों के पुनर्जीवन पर ठोस नीति बनाई जाए, तो पलायन की समस्या को काफी हद तक रोका जा सकता है। समय की मांग है कि प्रशासन, उद्योगपति, शैक्षणिक संस्थान और समाज मिलकर एक साझा रणनीति बनाएं। जब युवा अपने ही गांव और जिले में सम्मानजनक रोजगार पाएंगे, तभी सच्चे अर्थों में आत्मनिर्भर और सशक्त शेखावाटी का निर्माण होगा।