मुख्यमंत्री जन आवास योजना मामले में उपभोक्ता आयोग ने अपनाया सख्त रुख
झुंझुनूं में मुख्यमंत्री जन आवास योजना से जुड़े मामले में जिला प्रशासन के शीर्ष अधिकारी शुक्रवार को जिला उपभोक्ता आयोग में पेश हुए।
जानकारी के अनुसार जिला कलेक्टर अरुण गर्ग और अतिरिक्त जिला कलेक्टर अजय आर्य आयोग के समन के बाद अदालत में उपस्थित हुए।
आयोग ने जारी किए थे समन
झुंझुनूं जिला उपभोक्ता आयोग के अध्यक्ष मनोज कुमार मील और सदस्य प्रमेन्द्र सैनी ने मामले में सख्त रुख अपनाते हुए उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की धारा 72 के तहत कार्रवाई शुरू की थी।
आयोग ने मुख्यमंत्री जन आवास योजना के तहत 1536 लाभार्थियों को न्याय नहीं मिलने और आयोग के आदेशों की अवहेलना के मामले को गंभीर माना।
इसी के चलते कई प्रशासनिक अधिकारियों को 13 मार्च को व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में पेश होने के निर्देश दिए गए थे।
इन अधिकारियों को किया गया था तलब
मामले में आयोग ने कई अधिकारियों को पेश होने के लिए तलब किया था, जिनमें शामिल हैं:
- अरुण गर्ग – जिला कलेक्टर
- अजय आर्य – अतिरिक्त जिला कलेक्टर (ADM)
- देवीलाल बोचलिया – नगर परिषद कमिश्नर
- हवाई सिंह यादव – तत्कालीन SDM
- कौशल्या विश्नोई – वर्तमान SDM
- महेंद्र मूंड – तहसीलदार
समन की तामील सुनिश्चित करने के लिए आयोग ने पुलिस अधीक्षक (SP) को जिम्मेदारी सौंपी थी।
मुख्यमंत्री जन आवास योजना से जुड़ा है मामला
यह मामला झुंझुनूं के मंड्रेला रोड स्थित मुख्यमंत्री जन आवास योजना से जुड़ा हुआ है।
उपभोक्ता आयोग ने पहले लाभार्थियों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए नगर परिषद को आदेश दिया था कि:
- सभी सुविधाओं के साथ फ्लैट्स का कब्जा सौंपें
या - लाभार्थियों की जमा राशि ब्याज और मानसिक संताप के मुआवजे सहित लौटाएं
नगर परिषद ने इस फैसले को राज्य और राष्ट्रीय आयोग में चुनौती दी थी, लेकिन दोनों जगह अपील खारिज हो गई और जिला आयोग का फैसला बरकरार रहा।
जमीन कुर्क करने के बाद विवाद बढ़ा
मामले में नया मोड़ तब आया जब तत्कालीन SDM हवाई सिंह यादव ने अवार्ड राशि की वसूली के लिए नगर परिषद की खसरा नंबर 1691 की भूमि को कुर्क कर लिया था।
नियमों के अनुसार इस जमीन पर उपभोक्ता आयोग के नाम का म्यूटेशन भी दर्ज किया गया।
लेकिन बाद में आरोप है कि कुर्क की गई भूमि को बिना अनुमति मुक्त कर दिया गया और नगर परिषद ने उसके कुछ हिस्सों को खुली बोली में बेच दिया।
बताया जा रहा है कि जमीन बेचने से मिली राशि न तो आयोग में जमा कराई गई और न ही पीड़ितों को दी गई।
न्यायिक अवज्ञा मान रहा आयोग
पीड़ितों की शिकायत के बाद आयोग ने इस पूरे मामले को ‘न्यायिक अवज्ञा’ माना है।
कानून विशेषज्ञों के अनुसार उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की धारा 72 के तहत दोषी पाए जाने पर अधिकारियों को:
- 3 साल तक की जेल
- 1 लाख रुपये तक का जुर्माना
हो सकता है।
पीड़ितों को मिल सकती है बड़ी राहत
सूत्रों के अनुसार इस मामले को सबसे पहले परिवादी दिलीप कुमार ने कोर्ट में उठाया था। बाद में अन्य लाभार्थियों ने भी न्याय के लिए आयोग का दरवाजा खटखटाया।
लंबे समय से चल रहे इस मामले में अब पीड़ितों को राहत मिलने की उम्मीद बढ़ गई है और जल्द ही बड़ा फैसला सामने आ सकता है।
