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आदर्श समाज समिति इंडिया ने मनाया विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस

विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस पर तस्वीर का किया विमोचन

झुंझुनू, राष्ट्रीय साहित्य व सामाजिक संगठन आदर्श समाज समिति इंडिया ने नवलगढ़ विधानसभा क्षेत्र में स्थित तीर्थ स्थल लोहार्गल के बाबा रामदेव मंदिर में 1947 में विभाजन की त्रासदी में मारे गये निर्दोष, बेबस, लाचार, बेसहारा लोगों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनकी याद में विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस मनाया। इस मौके पर मनोहर लाल मोरदिया, कृष्णदास महाराज, सुभाष बुनकर, बलवीर झीगर, रामनाथ सुरेला, केशरदेव धानियां, सुखराम मेघवाल, कन्हैयालाल वर्मा, बाबूलाल मेघवाल आदि अन्य लोग मौजूद रहे। विभाजन की त्रासदी में मारे गए लाखों लोगों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए सामाजिक कार्यकर्ता सुभाष बुनकर ने कहा- हम 2022 में खड़े होकर 1947 को देखते हैं तो थोड़ा बहुत धुंधला सा नजर आता है, वह भी जब हम कोई विभाजन की कहानियां पढ़ते हैं या इतिहास की थोड़ी बहुत जानकारी रखते हैं। लेकिन कुछ लोगों को 1947 का खौफनाक मंजर आज भी याद है। भारत-पाकिस्‍तान का बंटवारा दुनिया के इतिहास की सबसे भीषण मानवीय त्रासदी रही है, लेकिन विभाजन की इस सच्‍चाई को हमने कभी नहीं जानना जरूरी नहीं समझा। सच्चाई जानोगे तो सिर चकरा जाएगा क्‍योंकि इतिहास भी हो गया था, सबसे बड़ी त्रासदी पर शर्मिंदा..!

सरकार के आह्वान पर लोग आज आजादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं तो कोई घर-घर तिरंगा अभियान में बढ़ चढ़कर हिस्सा ले रहा है लेकिन कोई भी विभाजन की त्रासदी के बारे में जानना जरूरी नहीं समझता है। कहते हैं कि जो इतिहास को भूल जाते हैं, वे उसे दोहराने के लिए अभिशप्त होते हैं। आजादी के बाद से हमें यही बताया जा रहा है कि विभाजन के समय की विभीषिका को भूल जाओ। इतिहास को न तो भुलाया जा सकता है और न ही छिपाया जा सकता है। जब-जब इस तरह का प्रयास होता है, उसके परिणाम बुरे ही निकलते हैं। क्योंकि सच की एक बुरी आदत है कि वह सामने आने का रास्ता खोज ही लेता है। 1947 का सच यही है कि आजादी के सुनहरे भविष्य का लालच देकर देश की जनता को विभाजन का जहरीला घूंट पिला दिया। आदर्श समाज समिति इंडिया के अध्यक्ष धर्मपाल गांधी ने कहा- देश का विभाजन एक अमानवीय त्रासदी थी। हमें आजादी का उत्सव मनाने के साथ 1947 में देश के मानस पटल पर जो सांप्रदायिकता विभाजन की स्थायी लकीर खींची थी, उस विभाजन विभीषिका को भी याद करना चाहिये। इतिहास के इस कलंकित अध्याय से हमें सबक लेना चाहिए। भारत का विभाजन विश्व के सबसे बड़े नरसंहार के रूप में याद किया जाता है। एक अनुमान के मुताबिक विभाजन की रूह कंपा देने वाली अमानवीय मानव जाति के इतिहास को शर्मिंदा कर देने वाली त्रासदी में तकरीबन बीस लाख से ज्यादा निर्दोष लोग बेमौत मारे गये, जिनको अंतिम संस्कार के लिए जगह भी नसीब नहीं हुई और उनके बारे में आज तक किसी ने जानना भी जरूरी नहीं समझा। एक लाख से ज्यादा महिलाओं का अपहरण व बलात्कार हुआ। बलात्कार के बाद तकरीबन महिलाओं को मौत के घाट उतार दिया। आजादी के साथ देश का बंटवारा हुआ लेकिन शांतिपूर्ण नहीं हुआ। इस ऐतिहासिक घटना ने कई खूनी मंजर देखे। कह सकते हैं कि भारत का विभाजन सबसे खूनी घटनाक्रम का दस्तावेज बन गया जिसे हमेशा उलटना-पलटना पड़ता है। दोनों देशों के बीच बंटवारे की लकीर खिंचते ही रातों रात लाखों लोग अपने ही देश में बेगाने और बेघर हो गये। धर्म-मजहब के आधार पर लाखों लोग न चाहते हुए भी इस पार से उस पार जाने को मजबूर हुए। इस अदला-बदली में लाखों लोगों का कत्लेआम हुआ। कातिलाना हमले में जो लोग बच गए, उनकी जिंदगी हमेशा के लिए तहस-नहस हो गई। विभाजन की यह घटना सदी की सबसे बड़ी त्रासदी में बदल गई। यह किसी देश की भौगोलिक सीमा का बंटवारा नहीं बल्कि लोगों के दिलों और भावनाओं का भी बंटवारा था। यह दर्द गाहे-बगाहे अब भी हरा हो जाता है। 14 अगस्त 1947 को याद करने के पीछे कई उद्देश्यों की कल्पना की जा सकती है। जैसे कि उस दौरान की पीड़ाओं को याद करते हुए देशवासियों से इस आशय के संकल्प करवाए जाएँ कि वे नागरिक जीवन में अपने बीच धर्म और सम्प्रदाय के नाम पर किसी भी तरह का बँटवारा नहीं होने देंगे। राजनीतिक अथवा साम्प्रदायिक स्तरों पर किये जानेवाले ऐसे किसी भी प्रयास का वे समर्थन नहीं करेंगे।

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