डालर के मुकाबले भारतीय रुपये लगातार निचले स्तर को छू रहा है। डालर के मुकाबले रुपया गिरने से जहां देश में महंगाई लगातार बढ़ रही है और इसका तेल की कीमतों पर असर दिखाई दे रहा है।
वहीं सबसे ज्यादा प्रभाव विदेश में विभिन्न कोर्सों में पढ़ाई कर रहे विद्यार्थियों पर पड़ रहा है। जहां पर प्रति साल पढ़ाई पर होने वाले खर्च ज्यादा बढ़ गया है। 28 फरवरी को युद्ध शुरू होने के समय डॉलर के मुकाबले रुपया करीब 90 के स्तर पर था,
लेकिन वैश्विक अनिश्चितता और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी के कारण 19 मई तक रुपया गिरकर 96.51 प्रति डॉलर पहुंच गया। इसका असर उन भारतीय छात्रों और परिवारों पर पड़ा है जो विदेश में पढ़ाई कर रहे हैं। फीस से लेकर रहने खाने तक का खर्च तेजी से बढ़ गया है।
फीस का बढ़ा बोझ
रुपए में गिरावट का सबसे सीधा असर विदेश में पढ़ रहे छात्रों की का ट्यूशन फीस पर पड़ा है। अमरीका, ब्रिटेन और यूरोप की यूनिवर्सिटीज में फीस डॉलर और पाउंड में जमा करनी होती है, ऐसे में भारतीय परिवारों को ज्यादा रकम चुकानी पड़ रही है।
दो लाख से ज्यादा का अतिरिक्त बोझ
यदि सालाना फीस 40,000 डॉलर है, तो रुपया गिरने के कारण खर्च में 2,16,000 की सीधी बढ़ोतरी हुई है।
एक्सचेंज रेट में बदलाव
युद्ध से पहले (फरवरी 2026): 01 डॉलर = 90.78
वर्तमान में (18 मई 2026): 01 डॉलर 96.35
प्रति डॉलर का नुकसान: 5.57 (रुपया करीब 5.95% कमजोर हुआ)
ट्यूशन फीस का गणित (सालाना 40.000 डॉलर पर)
पहले: 40,000 डॉलर × 90.78 36,31,200
अबः 40,000 डॉलर × 96.35 38,47,200
केवल फीस में अंतरः ₹2,16,000 का अतिरिक्त बोझ





