चिकित्सालेखसीकर

थनैला रोग की पहचान एवं बचाव

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दुधारू पशुओ के थन में सूजन, कडापन और दर्द “थनैला” रोग के लक्षण होते हैं| थनैला रोग के अलग अलग प्रकार होते है जैसे- अतितीव्र, तीव्र, कम तीव्र और दीर्घकालीन|  थनैला रोग में थन सूजे हुए, गर्म, सख्त और दर्ददायी हो जाते हैं| थनों से फटा हुआ, थक्के युक्त अथवा दही की तरह जमा हुआ दूध निकलता हैं| कभी कभी दूध के साथ रक्त भी निकलता हैं| दूध गन्दला और पीले-भूरे रंग का हो जाता हैं| दूध से दुर्गन्ध आने लगती है| थनों में गांठे पड जाती हैं, एवं आकर में छोटे भी हो सकते हैं| दूध की मात्रा कम हो जाती है| पशु को बुखार आता हैं| पशु खाना पीना कम कर देता हैं|

      रोग का कारण:-

  • विषाणु, जीवाणु, माईकोप्लाज्मा अथवा कवक के द्वारा होता हैं
    डॉ. तुषार महर्षि
  • संक्रमित पशु के संपर्क में आने से
  • दूध दुहने वाले के गंदे हाथों से
  • पशुओ के गंदे आवास
  • अप्रर्याप्त और अनियमित रूप से दूध दुहने
  • खुरदरा फर्श
  • थन में चोट लगने, संक्रमण होने

      थनैला रोग के पहचान हेतु जाँच:- 1) स्ट्रिप कप टेस्ट 2) कैलिफ़ोर्निया मेसटाइटीस टेस्ट

      रोग से बचाव:- पशुओ के आवास में मक्खियाँ नही होनी चाहिए| पशुओं के आवास के साफ एवं स्वच्छ रखे| फिनाइल से सफाई करे| दूध दुहने से पहले हाथ साफ करे और साफ बर्तन में ही दूध निकाले| दूध दुहने से पूर्व तथा बाद में 1{44d7e8a5cbfd7fbf50b2f42071b88e8c5c0364c8b0c9ec50d635256cec1b7b56} लाल दवा के घोल से थन साफ़ करना भी अच्छा रहता है| दुधारू पशुओं का दूध सूख जाने पर उनके थन में प्रतिजैविक उपचार करने पर अगले ब्यात तक थनैला की सम्भावना कम हो जाती हैं| दूध सही विधि से निकाला जाना चाहिए| थन में घाव हो जाने पर तुरंत उपचार करवाए| थनैला रोग के लक्षण दिखाई देते ही तुरंत वेटरनरी डॉक्टर से उपचार करवाए अन्यथा थन ख़राब हो जाने से पशुपालक को आर्थिक हानि उठानी पड़ती हैं|

 

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